अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ८ ] अरण्यकाण्ड १३५
स्वान्तःपुरे रहस्येतामशोकविपिनेऽक्षिपत् ।
राक्षसीभिः परिवृतां मातृबुद्धयाऽन्वपालयत् ॥ ६५ ॥
कृशाऽतिदीना परिकर्मवर्जिता
दुःखेन शुष्यद्वदनाऽतिविह्वला ।
राम रामेति विलप्यमाना
सीता स्थिता राक्षसवृन्दमध्ये ॥ ६६ ॥
उन्हें अपने अन्तःपुरके एकान्त देश अशोकवनमें रखा और राक्षसियोंसे घेरे रखकर मातृबुद्धिसे उनकी रक्षा करने लगा ॥ ६१–६५ ॥ उस स्थानमें अति कृश और दीनवदना सीताजी सब प्रकारका श्रृंगार छोड़कर दुःखके कारण अति शुष्कवदन और विह्वल होकर 'हा राम ! हा राम !' ऐसे विलाप करती हुई राक्षसोंके बीचमें रहने लगीं ॥ ६६ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
अष्टम सर्ग
सीताजीके वियोगमें भगवान् रामका विलाप और जटायुसे भेंट ।
श्रीमहादेव उवाच
रामो मायाविनं हत्वा राक्षसं कामरूपिणम् ।
प्रतस्थे स्वाश्रमं गन्तुं ततो दूराद्ददर्श तम् ॥ १ ॥
आयान्तं लक्ष्मणं दीनं मुखेन परिशुष्यता ।
राघवश्चिन्तयामास स्वात्मन्येव महामतिः ॥ २ ॥
लक्ष्मणस्तन्न जानाति मायासीतां मया कृताम् ।
ज्ञात्वाप्येनं वञ्चयित्वा शोचामि प्राकृतो यथा ॥ ३ ॥
यद्यहं विरतो भूत्वा तूष्णीं स्थास्यामि मन्दिरे ।
तदा राक्षसकोटीनां वधोपायः कथं भवेत् ॥ ४ ॥
यदि शोचामि तां दुःखसन्तप्तः कामुको यथा ।
तदा क्रमेणानुचिन्वन्सीतां यास्येऽसुरालयम् ।
रावणं सकुलं हत्वा सीतामग्नौ स्थितां पुनः ॥ ५ ॥
मयैव स्थापितां नीत्वा याताऽयोध्द्यामतन्द्रितः ।
अहं मनुष्यभावेन जातोऽस्मि ब्रह्मणाऽर्थितः ॥ ६ ॥
मनुष्यभावमापन्नः किञ्चित्कालं वसामि कौ ।
ततो मायामनुष्यस्य चरितं मेऽनुशृण्वताम् ॥ ७ ॥
मुक्तिः स्यादप्रयासेन भक्तिमार्गानुवर्तिनाम् ।
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! इधर रामचन्द्रजी जब कामरूपधारी मायावी राक्षसको मारकर अपने आश्रमपर चलनेको प्रस्तुत हुए तो उन्होंने दूरसे ही दीन और उदास मुखसे लक्ष्मणको आते देखा । तब महामति रघुनाथजी मन-ही-मन सोचने लगे ॥ १-२ ॥ 'लक्ष्मणको यह पता नहीं है कि मैंने मायामयी सीता बना दी है । मैं यह जानता हूँ तथापि लक्ष्मणसे यह बात छिपाकर मैं साधारण मनुष्यके समान शोक करूँगा ॥ ३ ॥ यदि मैं उपराम होकर चुपचाप अपनी कुटीमें बैठ गया तो इन करोड़ों राक्षसोंके नाशका उपाय कैसे होगा ? ॥ ४ ॥ यदि मैं उसके लिये दुःखातुर होकर कामी पुरुषके समान शोक करूँगा तो क्रमशः सीताकी खोज करता हुआ राक्षसराज रावणके यहाँ पहुँच जाऊँगा और उसे कुलसहित मारकर अपने आप ही अग्निमें स्थापित की हुई सीताको उसमेंसे निकालकर फिर तुरन्त अयोध्या चला जाऊँगा । ब्रह्माकी प्रार्थनासे मैंने मनुष्यावतार लिया है अतः मैं कुछ समय पृथिवीपर मनुष्य-भावसे ही रहूँगा । इससे मुझ माया-मानवके चरित्रोंको सुननेवाले भक्ति-परायण पुरुषोंकी अनायास ही मुक्ति हो जायगी ।'