भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१३६अध्यात्मरामायण[सर्ग. ८

निश्चित्यैवं तदा दृष्ट्वा लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥८॥
किमर्थमागतोऽसि त्वं सीतां त्यक्त्वा मम प्रियाम्।
नीता वा भक्षिता वापि राक्षसैर्जनकात्मजा ॥९॥

लक्ष्मणः प्राञ्जलिः प्राह सीताया दुर्वचो रुदन्।
हा लक्ष्मणेति वचनं राक्षसोक्तं श्रुतं तया ॥१०॥
त्वद्वाक्यसदृशं श्रुत्वा मां गच्छेति त्वराब्रवीत्।
रुदन्ती सा मया प्रोक्ता देवि राक्षसभाषितम्।
नेदं रामस्य वचनं स्वस्था भव शुचिस्मिते ॥११॥
इत्येवं सान्त्विता साध्वी मया प्रोवाच मां पुनः।
यदुक्तं दुर्वचो राम न वाच्यं पुरतस्तव ॥१२॥
कर्णौ पिधाय निर्गत्य यातोऽहं त्वां समीक्षितुम्।

रामस्तु लक्ष्मणं प्राह तथाऽप्यनुचितं कृतम् ॥१३॥
त्वया स्त्रीभाषितं सत्यं कृत्वा त्यक्ता शुभानना।
नीता वा भक्षिता वाऽपि राक्षसैर्नात्र संशयः ॥१४॥

इति चिन्तापरो रामः स्वाश्रमं त्वरितो ययौ।
तत्रादृष्ट्वा जनकतां विललापातिदुःखितः ॥१५॥
हा प्रिये क्व गताऽसि त्वं नासि पूर्ववदाश्रमे।
अथवा मन्विमोहार्थं लीलया क्व विलीयसे ॥१६॥

इत्याचिन्वन्वनं सर्वं नापश्यज्जानकीं तदा।
वनदेव्यः कुतः सीतां ब्रुवन्तु मम वल्लभाम् ॥१७॥
मृगाश्च पक्षिणो वृक्षा दर्शयन्तु मम प्रियाम्।
इत्येवं विलपन्नेव रामः सीतां न कुत्रचित् ॥१८॥
सर्वज्ञः सर्वथा क्वापि नापश्यद्रघुनन्दनः।
आनन्दोऽप्यन्वशोचत्तामचलोऽप्यनुधावति ॥१९॥


हिन्दी-अनुवाद:

श्रीरामचन्द्रजीने इसप्रकार निश्चयकर लक्ष्मणजीकी ओर देखकर कहा—॥५-८॥ “लक्ष्मण ! तुम प्राणप्रिया सीताको छोड़कर कैसे चले आये ? अब राक्षसगण जनकनन्दिनी सीताको हर ले गये होंगे अथवा उन्हें खा गये होंगे” ॥९॥

तब लक्ष्मणजीने हाथ जोड़कर रोते हुए सीताजीके दुर्वाक्य कह सुनाये। वे बोले— “आपके वाक्यके समान राक्षसके कहे हुए 'हा लक्ष्मण !' इस शब्दको सुनकर सीताजीने अति आतुरतासे रोते हुए मुझसे कहा 'फौरन जाओ'। तब मैंने उन्हें समझाया कि देवि ! यह रघुनाथजीका वाक्य नहीं है, राक्षसका शब्द है, हे शुचिस्मिते ! तुम निश्चिन्त रहो ॥१०-११॥ मेरे इस प्रकार ढाढस बँधानेपर भी साध्वी सीताजीने मुझसे जैसे दुर्बचन कहे हैं, हे रघुनाथजी ! वे आपके सामने कहने योग्य नहीं हैं ॥१२॥ अतः मैं कान मूँदकर वहाँसे आपको देखनेके लिये चला आया।”

इसपर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—“लक्ष्मण ! ठीक है, तथापि तुमने उचित नहीं किया ॥१३॥ जो स्त्रीकी बातको सत्य मानकर शुभानना सीताको छोड़ दिया ! इसमें सन्देह नहीं अब राक्षसलोग या तो उन्हें हर ले गये होंगे या खा गये होंगे” ॥१४॥

इस प्रकार चिन्ता करते हुए श्रीरामचन्द्रजी बड़ी शीघ्रतासे अपने आश्रममें आये और वहाँ जानकीजीको न देखकर अति दुःखित होकर विलाप करने लगे—॥१५॥ 'हा प्रिये ! आज तुम पूर्ववत् आश्रममें दिखायी नहीं देती हो, सो कहाँ चली गयी हो ? अथवा मुझे मोहित करनेके लिये विनोदसे ही कहीं छिप रही हो ? ॥१६॥

इस प्रकार विलाप करते हुए उन्होंने सारा वन छान डाला किन्तु कहीं भी जानकीजीको न पाया। तब वे कहने लगे—“अयि वनदेवियो ! बताओ मेरी प्राणवल्लभा सीता कहाँ है ? अरे मृग, पक्षी और वृक्षो ! तुम्हीं मेरी प्रियाको दिखाओ।” ॥१७॥ इस प्रकार विलाप करते हुए सर्वज्ञ श्रीरघुनाथजीने सीताजीका कहीं कुछ भी पता न पाया ॥१८॥ अहो ! भगवान् रामने आनन्दस्वरूप होकर भी सीताजीके लिये शोक किया, निश्चल होनेपर भी उनकी खोजमें इधर-उधर