भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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माहात्म्य \qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad मः


लक्ष्मणायार्पितां गीतासुधां पीत्वाऽमरो भवेत् ४९
जमदग्निसुतः पूर्वं कार्तवीर्यवधेच्छया ।
धनुर्विद्यामभ्यसितुं महेशस्यान्तिके वसन् ॥५०॥
अधीयमानां पार्वत्या रामगीतां प्रयत्नतः ।
श्रुत्वा गृहीत्वाऽऽशु पठन्नारायणकलामागात्॥५१॥
ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं यदि वाञ्छति।
रामगीतां मासमात्रं पठित्वा मुच्यते नरः ॥५२॥
दुष्प्रतिग्रहदुर्भोज्यदुरालापादिसम्भवम् ।
पापं यत्तत्कीर्तनेन रामगीता विनाशयेत् ॥५३॥
शालग्रामशिलाग्रे च तुलस्यश्वत्थसन्निधौ ।
यतीनां पुरतस्तद्वद्रामगीतां पठेत्तु यः ॥५४॥
स तत्फलमवाप्नोति यद्वाचोऽपि न गोचरम्॥५५॥
रामगीतां पठन्भक्त्या यः श्राद्धे भोजयेद्द्विजान् ।
तस्य ते पितरः सर्वे यान्ति विष्णोः परं पदम् ॥५६॥
एकादश्यां निराहारो नियतो द्वादशीदिने ।
स्थित्वाऽगस्त्यतरोर्मूले रामगीतां पठेत्तु यः ।
स एव राघवः साक्षात्सर्वदेवैश्च पूज्यते ॥५७॥
विना दानं विना ध्यानं विना तीर्थावगाहनम् ।
रामगीतां नरोऽधीत्य तदनन्तफलं लभेत् ॥५८॥
बहुना किमिहोक्तेन शृणु नारद तत्त्वतः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासागमशतानि च ।
अर्हन्ति नाल्पमध्यात्मरामायणकलामपि ॥५९॥
अध्यात्मरामचरितस्य मुनीश्वराय
माहात्म्यमेतदुदितं कमलासनेन ।
यः श्रद्धया पठति वा शृणुयात्स मर्त्यः
प्राप्नोति विष्णुपदवीं सुरपूज्यमानः॥६०॥


मन्थन कर निकाला और फिर बड़ी प्रसन्नतासे लक्ष्मण-जीको दिया (मनुष्यको चाहिये कि) उसका पान करके अमर हो जाय ॥ ४९ ॥ पूर्वकालमें सहस्रार्जुनके वधकी इच्छासे जमदग्निनन्दन परशुरामजी धनुर्विद्याका अभ्यास करनेके लिये श्रीमहादेवजीके पास रहते थे ॥५०॥ उस समय रामगीताका अध्ययन करती हुई पार्वतीजीसे इसे यत्नपूर्वक सुनकर और तुरन्त ही हृदयंगम कर इसका पाठ करते-करते वे श्रीनारायणकी कलारूप हो गये ॥ ५१ ॥ यदि कोई पुरुष ब्रह्महत्या आदि घोर पापोंसे मुक्त होना चाहे तो केवल एकमास रामगीताका पाठ करनेसे छूट सकता है ॥५२॥ बुरे दान, निषिद्ध भोजन और खोटी बोलचाल आदिसे जो पाप होता है उसे रामगीता पाठमात्रसे नष्ट कर देती है ॥५३॥ जो पुरुष शालग्राम शिलाके आगे, तुलसी या पीपलके पास अथवा यतिजनोंके सामने रामगीताका पाठ करता है उसे वह फल मिलता है जो वाणीका भी विषय नहीं है ॥५४-५५॥ जो मनुष्य श्राद्धमें रामगीताका भक्तिपूर्वक पाठ करके ब्राह्मणोंको भोजन कराता है उसके वे समस्त पितृगण भगवान् विष्णुके परम धामको जाते हैं ॥५६॥ जो पुरुष एकादशीके दिन निराहार और जितेन्द्रिय रहकर द्वादशीको अगस्त्य वृक्षके नीचे बैठकर रामगीताका पाठ करता है वह साक्षात् रामरूप ही है, उसकी समस्त देवगण पूजा करते हैं ॥५७॥ रामगीताका पाठ करनेसे मनुष्य बिना किसी दान, ध्यान अथवा तीर्थस्नानके ही अक्षय फल पाता है ॥५८॥ हे नारद ! और अधिक क्या कहा जाय जो वास्तविक बात है वह सुन—श्रुति, स्मृति, पुराण और इतिहास आदि सैकड़ों शास्त्र श्रीअध्यात्मरामायणकी एक तुच्छ कलाके समान भी नहीं हैं” ॥५९॥

यह अध्यात्मरामायणका माहात्म्य श्रीब्रह्माजीने मुनिराज नारदसे कहा है । इसे जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक पढ़ता या सुनता है वह देवताओंसे पूजित होकर श्रीविष्णुभगवान्का पद प्राप्त करता है ॥६०॥


इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे उत्तरखण्डेऽध्यात्मरामायण-
माहात्म्यं सम्पूर्णम्