भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२१४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ५

अद्राक्षं जानकीमत्र शोचन्तीं दुःखसम्प्लुताम् ॥ १४ ॥
रामस्य महिषीं देवीं कृतकृत्योऽहमागतः ।
इत्युक्त्वोपररामाथ मारुतिर्बुद्धिमत्तरः ॥ १५ ॥
जानकीजीको अति क्लेशसे शोक करते पाया । इनके दर्शनसे मेरा यहाँ आना सफल हो गया ।” ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् श्रीहनुमान्जी मौन हो गये ॥ १०-१५ ॥


सीता क्रमेण तत्सर्वं श्रुत्वा विस्मयमाययौ ।
किमिदं मे श्रुतं व्योम्नि वायुना समुदीरितम् ॥ १६ ॥
स्वप्नो वा मे मनोभ्रान्तिर्यदि वा सत्यमेव तत् ।
निद्रा मे नास्ति दुःखेन जानाम्येतत्कुतो भ्रमः ॥ १७ ॥
येन मे कर्णपीयूषं वचनं समुदीरितम् ।
स दृश्यतां महाभागः प्रियवादी समाग्रतः ॥ १८ ॥
क्रमशः ये सब बातें सुनकर सीताजीको बड़ा विस्मय हुआ और वे कहने लगीं, “मैने जो आकाशमें शब्द सुना है वह क्या वायुका उच्चारण किया हुआ है ? ॥ १६ ॥ अथवा स्वप्न या मेरे मनकी भ्रान्ति है ? अथवा यह सब सत्य ही तो नहीं है, क्योंकि दुःखके कारण नींद तो मुझे आती नहीं, (फिर स्वप्न कैसे हो सकता है ?) और मैं प्रत्यक्ष सुन रही हूँ इसलिये यह भ्रम भी कैसे हो सकता है ? (अतः निश्चय ही यह सब यथार्थ है) ॥ १७ ॥ सुतरां, जिसने मेरे कानोंको अमृतके समान प्रिय लगनेवाले ये वचन कहे हैं वह प्रियभाषी महाभाग मेरे सामने प्रकट हों” ॥ १८ ॥


श्रुत्वा तज्जानकीवाक्यं हनुमान्पत्रखण्डतः ।
अवतीर्य शनैः सीतापुरतः समवस्थितः ॥ १९ ॥
कलविङ्कप्रमाणाङ्गो रक्तास्यः पीतवानरः ।
ननाम शनकैः सीतां प्राञ्जलिः पुरतः स्थितः ॥ २० ॥
जानकीजीके ये वचन सुनकर हनुमान्जी शनैः-शनैः उस वृक्षके पत्र-भागसे उतरकर सीताजीके सामने खड़े हो गये ॥ १९ ॥ उस समय उन्होंने अरुण-वदन, पीतवर्ण और कलविंक (चटक) पक्षीके बराबर आकारवाले वानरके रूपसे धीमेसे सामने आकर सीताजीको हाथ जोड़कर प्रणाम किया ॥ २० ॥


दृष्ट्वा तं जानकी भीता रावणोऽयमुपागतः ।
मां मोहयितुमायातो मायया वानराकृतिः ॥ २१ ॥
इत्येवं चिन्तयित्वा सा तूष्णीमासीदधोमुखी ।
उसे देखकर जानकीजीको यह भय हुआ कि मुझे फँसानेके लिये मायासे वानररूप धारण कर यह रावण ही आया है ॥ २१ ॥ यह सोचकर वे चुपचाप नीचेको मुख किये बैठी रहीं ।


पुनरप्याह तां सीतां देवि यत्त्वं विशङ्कसे ॥ २२ ॥
नाहं तथाविधो मातस्त्यज शङ्कां मयि स्थिताम् ।
दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्य परमात्मनः ॥ २३ ॥
सचिवोऽहं हरीन्द्रस्य सुग्रीवस्य शुभप्रदे ।
वायोः पुत्रोऽहमखिलप्राणभृतस्य शोभने ॥ २४ ॥
तब हनुमान्जीने सीताजीसे फिर कहा— “देवि ! आप जैसी आशङ्का कर रही हैं मैं वह नहीं हूँ । हे मातः ! मेरे विषयमें आपको जो शङ्का हो रही है उसे दूर करें । हे शुभप्रदे ! मैं तो कोसलाधिपति परमात्मा रामका दास और वानरराज सुग्रीवका मन्त्री हूँ तथा हे शोभने ! सम्पूर्ण जगत्के प्राणस्वरूप पवनदेवका मैं पुत्र हूँ” ॥ २२-२४ ॥


तच्छ्रुत्वा जानकी प्राह हनूमन्तं कृताञ्जलिम् ।
वानराणां मनुष्याणां सङ्गतिर्घटते कथम् ॥ २५ ॥
यथा त्वं रामचन्द्रस्य दासोऽहमिति भाषसे ।
तामाह मारुतिः प्रीतो जानकीं पुरतः स्थितः ॥ २६ ॥
यह सुनकर श्रीजानकीजीने हाथ बाँधे खड़े हुए हनुमान्जीसे कहा—“तुम जो कहते हो कि मैं श्रीरामचन्द्रजीका दास हूँ, सो भला वानर और मनुष्योंकी मित्रता कैसे हो सकती है ?” तब सामने खड़े हुए हनुमान्जीने प्रसन्न होकर जानकीजीसे कहा ॥ २५-२६ ॥ “शबरीकी प्रेरणासे

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