भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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अध्यात्मरामायण

युद्धकाण्ड


प्रथम सर्ग

वानर-सेनाका प्रस्थान।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
यथावद्भाषितं वाक्यं श्रुत्वा रामो हनूमतः ।<br>उवाचानन्तरं वाक्यं हर्षेण महताऽऽवृतः ॥ १ ॥हे पार्वति ! हनुमान्जीके ज्यों-के-त्यों कहे हुए वाक्योंको सुननेके अनन्तर श्री-रामचन्द्रजीने अति हर्षसे भरकर ये वचन कहे—॥ १ ॥
कार्यं कृतं हनुमता देवैरपि सुदुष्करम् ।<br>मनसाऽपि यदन्येन स्मर्तुं शक्यं न भूतले ॥ २ ॥“हनुमान्जीने जो कार्य किया है उसका करना देवताओंको भी अति कठिन है, पृथ्वीतलपर और कोई तो उसका मनसे भी स्मरण नहीं कर सकता ॥ २ ॥
शतयोजनविस्तीर्णं लङ्घयेत्कः पयोनिधिम् ।<br>लङ्कां च राक्षसैर्गुप्तां को वा धर्षयितुं क्षमः ॥ ३ ॥भला ऐसा कौन है जो सौ योजन विस्तारवाले समुद्रको लाँघने और राक्षसोंसे सुरक्षिता लङ्कापुरीका ध्वंस करनेमें समर्थ हो ? ॥ ३ ॥
भृत्यकार्यं हनुमता कृतं सर्वमशेषतः ।<br>सुग्रीवस्येदृशो लोके न भूतो न भविष्यति ॥ ४ ॥हनुमान्ने सुग्रीवके समग्र सेवक-धर्मको खूब निभाया । संसारमें ऐसा न कोई हुआ और न आगे होगा ही ॥ ४ ॥
अहं च रघुवंशश्च लक्ष्मणश्च कपीश्वरः ।<br>जानक्या दर्शनेनाद्य रक्षिताःस्मो हनूमता ॥ ५ ॥हनुमान्ने जानकीजीको देखकर आज मुझको तथा रघुवंश, लक्ष्मण और सुग्रीव आदि सभीको बचा लिया है ॥५॥
सर्वथा सुकृतं कार्यं जानक्याः परिमार्गणम् ।<br>समुद्रं मनसा स्मृत्वा सीदतीव मनो मम ॥ ६ ॥जानकीजीकी खोजका कार्य तो बिलकुल ठीक हो गया, किन्तु समुद्रकी याद आनेसे मेरा मन व्यथित-सा होने लगता है ॥ ६ ॥
कथं नक्रझषाकीर्णं समुद्रं शतयोजनम् ।<br>लङ्घयित्वा रिपुं हन्यां कथं द्रक्ष्यामि जानकीम् ॥७॥नाके और मकरोंसे भरे हुए सौ योजन विस्तारवाले समुद्रको लाँघकर मैं शत्रुको कैसे मारूँगा ? और जानकीजीको कैसे देख सकूँगा ? ॥७॥
श्रुत्वा तु रामवचनं सुग्रीवः प्राह राघवम् ।<br>समुद्रं लङ्घयिष्यामो महानक्रझषाकुलम् ॥८॥श्रीरघुनाथजीके ये वचन सुनकर सुग्रीव उनसे बोला—
लङ्कां च विधमिष्यामो हनिष्यामोऽद्य रावणम् ।<br>चिन्तां त्यज रघुश्रेष्ठ चिन्ता कार्यविनाशिनी ॥९॥“हम बड़े-बड़े नाके और मछलियोंसे पूर्ण समुद्रको लाँघ जायँगे और शीघ्र ही लङ्काको विध्वंस कर रावणका भी नाश करेंगे । रघुनाथजी ! आप चिन्ता छोड़िये, चिन्ता तो कार्य बिगाड़नेवाली होती है

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