अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| २३४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १ |
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| एतान्यश्य महासत्त्वान् शूरान्वानरपुङ्गवान् ।<br>त्वत्प्रियार्थं समुद्युक्तान्प्रवेष्टुमपि पावकम् ॥१०॥<br><br>समुद्रतरणे बुद्धिं कुरुष्व प्रथमं ततः ।<br>दृष्ट्वा लङ्कां दशग्रीवो हत इत्येव मन्महे ॥ ११॥<br><br>नहि पश्याम्यहं कश्चित्त्रिषु लोकेषु राघव ।<br>गृहीतधनुषो यस्ते तिष्ठेदभिमुखो रणे ॥१२॥<br><br>सर्वथा नो जयो राम भविष्यति न संशयः ।<br>निमित्तानि च पश्यामि तथाभूतानि सर्वशः॥१३॥<br><br>सुग्रीववचनं श्रुत्वा भक्तिवीर्यसमन्वितम् ।<br>अङ्गीकृत्याब्रवीद्रामो हनूमन्तं पुरःस्थितम् ॥१४॥<br><br>येन केन प्रकारेण लङ्घयामो महार्णवम् ।<br>लङ्कास्वरूपं मे ब्रूहि दुःसाध्यं देवदानवैः ॥१५॥<br><br>ज्ञात्वा तस्य प्रतीकारं करिष्यामि कपीश्वर ।<br>श्रुत्वा रामस्य वचनं हनूमान्विनयान्वितः ॥१६॥<br><br>उवाच प्राञ्जलिर्देव यथा दृष्टं ब्रवीमि ते ।<br>लङ्का दिव्या पुरी देव त्रिकूटशिखरे स्थिता ॥१७॥<br><br>स्वर्णप्राकारसहिता स्वर्णाट्टालकसंयुता ।<br>परिखाभिः परिवृता पूर्णाभिर्निर्मलोदकैः ॥१८॥<br><br>नानोपवनशोभाढ्या दिव्यवापीभिरावृता ।<br>गृहैर्विचित्रशोभाढ्यैर्मणिस्तम्भमयैः शुभैः ॥१९॥<br><br>पश्चिमद्वारमासाद्य गजवाहाः सहस्रशः ।<br>उत्तरे द्वारि तिष्ठन्ति साश्ववाहाः सपत्तयः ॥२०॥<br><br>तिष्ठन्त्यर्बुदसङ्ख्याकाः प्राच्यामपि तथैव च ।<br>दक्षिणे राक्षसा वीर द्वारं दक्षिणमाश्रिताः ॥२१॥<br><br>मध्यकक्षेऽप्यसङ्ख्याता गजाश्वरथपत्तयः ।<br>रक्षयन्ति सदा लङ्कां नानास्त्रकुशलाः प्रभो ॥२२॥ | ॥ ८-९ ॥ आप इन महापराक्रमी और शूरवीर वानर-वीरोंको देखिये। ये आपका प्रिय करनेके लिये अग्निमें प्रवेश करनेको भी तैयार हैं ॥ १० ॥ पहले समुद्र पार करनेका विचार कीजिये, फिर लङ्काके तो दर्शन होते ही हम रावणको मरा हुआ ही समझते हैं ॥ ११ ॥ हे राघव ! त्रिलोकीमें मुझे ऐसा कोई वीर दिखायी नहीं देता जो आपके धनुष ग्रहण करनेपर युद्धमें सामने डटा रहे ॥ १२ ॥ हे राम ! इसमें तनिक भी सन्देह नहीं सब प्रकारसे जीत हमारी ही होगी, क्योंकि मुझे सब ओर ऐसे ही कारण (शकुन) दिखायी दे रहे हैं" ॥ १३ ॥<br><br>सुग्रीवके ये भक्ति और पुरुषार्थसे भरे वचन सुनकर भगवान् रामने उन्हें सादर स्वीकार किया और फिर सामने खड़े हुए हनुमान्जीसे कहा—॥१४॥ "हम जैसे-तैसे समुद्र तो पार करेंगे ही, किन्तु तुम लङ्काका रूप तो बताओ। सुना है, उसे जीतना तो देवता और दानवोंको भी अत्यन्त कठिन है ॥ १५॥ हे कपीश्वर ! उसका स्वरूप विदित होनेपर मैं उसका कोई प्रतिकार सोचूँगा।"<br><br>रामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर हनुमान्जीने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा—"देव ! मैंने जैसा कुछ देखा है वह आपसे निवेदन करता हूँ। दिव्यपुरी लङ्का त्रिकूटपर्वतके शिखरपर बसी हुई है ॥१६-१७॥ उसका सोनेका परकोटा है और उसमें सोनेकी ही अट्टालिकाएँ हैं तथा वह निर्मल जलसे भरी खाइयोंसे घिरी हुई है ॥ १८ ॥ अनेकों उपवनोंके कारण उसकी अत्यन्त शोभा हो रही है और उसमें जहाँ-तहाँ बहुत-सी वावड़ियाँ तथा विचित्रशोभासम्पन्न मणिस्तम्भयुक्त भवन शोभायमान हैं ॥१९॥ उसके पश्चिमद्वारपर हजारों गजारोही, उत्तरद्वारपर पैदल सेनाके सहित बहुत-से घुड़सवार, पूर्वद्वारपर एक अरब राक्षस वीर और दक्षिणद्वारपर भी इतने ही रक्षक रहते हैं ॥ २०-२१ ॥ हे प्रभो ! उसके मध्यभागमें भी हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी असंख्य सेना रहकर नगरकी रक्षा करती है। वे सब नाना प्रकारके शस्त्र चलानेमें अत्यन्त कुशल हैं ॥ २२ ॥ इस प्रकार लङ्कामें |