भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ३ ]युद्धकाण्ड२४५
साधुसाध्विति ते सर्वे वानरास्तुष्टुवुर्भृशम् ।<br>सुग्रीवोऽपि परिष्वज्य विभीषणमथाब्रवीत् ॥४६॥<br>विभीषण वयं सर्वे रामस्य परमात्मनः ।<br>किङ्करास्तत्र मुख्यस्त्वं भक्त्या रामपरिग्रहात् ।<br>श्रावणस्य विनाशे त्वं साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥४७॥है' ऐसा कहने लगे; और सुग्रीवने विभीषणको गले लगाकर कहा—॥ ४६ ॥ “विभीषण ! हम सब परमात्मा रामके दास हैं, तथापि तुम हम सबमें प्रधान हो क्योंकि तुमने केवल भक्तिसे ही उनकी शरण ली है। अब तुम्हें रावणका नाश करानेमें हमारी सहायता करनी चाहिये” ॥ ४७ ॥
विभीषण उवाच<br>अहं कियान्सहायत्वे रामस्य परमात्मनः ।<br>किं तु दास्यं करिष्येऽहं भक्त्या शक्त्या ह्यमायया॥४८॥विभीषण बोले—“मैं परमात्मा रामकी क्या सहायता कर सकता हूँ, तथापि मुझसे जैसी कुछ बनेगी निष्कपट होकर भक्तिभावसे उनकी सेवा करता रहूँगा” ॥ ४८ ॥
दशग्रीवेण सन्दिष्टः शुको नाम महासुरः ।<br>संस्थितो ह्यम्बरे वाक्यं सुग्रीवमिदमब्रवीत् ॥४९॥<br>त्वामाह रावणो राजा भ्रातरं राक्षसाधिपः ।<br>महाकुलप्रसूतस्त्वं राजाऽसि वनचारिणाम् ॥५०॥<br>मम भ्रातृसमानस्त्वं तव नास्त्यर्थविप्लवः ।<br>अहं यदहरं भार्यां राजपुत्रस्य किं तव ॥५१॥<br>किष्किन्धां याहि हरिभिर्लङ्का शक्या न दैवतैः।<br>प्राप्तुं किं मानुषैरल्पसत्त्वैर्वानरयूथपैः ॥५२॥<br>तं ज्ञापयन्तं वचनं तूर्णमुत्प्लुत्य वानराः ।<br>आपद्यन्त तदा क्षिप्रं निहन्तुं दृढमुष्टिभिः ॥५३॥<br>वानरैर्हन्यमानस्तु शुको राममथाब्रवीत् ।<br>न दूतान् घ्नन्ति राजेन्द्र वानरान्वारय प्रभो ॥५४॥<br>रामः श्रुत्वा तदा वाक्यं शुकस्य परिदेवितम् ।<br>मा वधिष्टेति रामस्तान्वारयामास वानरान् ॥५५॥<br>पुनरम्बरमासाद्य शुकः सुग्रीवमब्रवीत् ।<br>ब्रूहि राजेन्द्रदशग्रीवं किं वक्ष्यामि व्रजाम्यहम् ॥५६॥इसी समय रावणका भेजा हुआ शुक नामक महादैत्य आकाशमें स्थित होकर सुग्रीवसे इस प्रकार बोला—॥ ४९ ॥ “राक्षसराज रावण तुम्हें अपने भाईके समान मानते हैं, उन्होंने तुम्हारे लिये कहा है कि तुम बड़े कुलमें उत्पन्न हुए हो और वानरोंके राजा हो ॥ ५० ॥ तुम मेरे भाईके समान हो और तुम्हारा कोई कार्यघात भी नहीं हुआ है। यदि मैंने किसी राजकुमारकी स्त्रीको हर ही लिया तो उससे तुम्हें क्या ? ॥५१॥ अतः तुम अपने वानरोंके सहित किष्किन्धाको लौट जाओ। लंकाको पाना तो देवताओंके लिये भी कठिन है, फिर अल्पशक्ति मनुष्य और वानरयूथपोंकी तो बात ही क्या है ?” ॥५२॥ जिस समय शुक इस प्रकार सन्देश सुना रहा था, वानरोंने अपने सुदृढ घूँसोंसे मारनेके लिये उसे तुरन्त ही उछलकर पकड़ लिया ॥ ५३ ॥ वानरोंके मारनेपर शुकने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—"हे राजेन्द्र ! (विज्ञजन) दूतको मारा नहीं करते, अतः हे प्रभो ! इन वानरोंको रोकिये” ॥ ५४ ॥ शुकका यह करुणा-युक्त वचन सुनकर रामने 'इसे मत मारो' ऐसा कहकर वानरोंको रोक दिया ॥ ५५ ॥ तब शुकने फिर आकाशमें चढ़कर सुग्रीवसे कहा—"हे राजन् ! मैं जाता हूँ; कहिये, रावणको आपकी ओरसे क्या उत्तर दूँ ?” ॥ ५६ ॥
सुग्रीव उवाच<br>यथा वाली मम भ्राता तथा त्वं राक्षसाधम ।<br>हन्तव्यस्त्वं मया यालात्सपुत्रबलवाहनः ॥५७॥**सुग्रीवने कहा—**उससे कहना, जिस प्रकार मैंने अपने भाई वालीको मारा था, हे राक्षसाधम ! उसी प्रकार तू भी अपने पुत्र, सेना और वाहनादिके सहित
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