भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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४४ अध्यात्मरामायण [ सर्गः २


श्रुत्वैतद्गदितं रामो नारदं प्राह सस्मितम् ॥३५॥<br>शृणु नारद मे किञ्चिद्विद्यतेऽविदितं क्वचित् ।<br>प्रतिज्ञातं च यत्पूर्वं करिष्ये तन्न संशयः ॥३६॥<br>किन्तु कालानुरोधेन तत्तत्प्रारब्धसंक्षयात् ।<br>हरिष्ये सर्वभूभारं क्रमेणासुरमण्डलम् ॥३७॥<br>रावणस्य विनाशार्थं श्वो गन्ता दण्डकाननम् ।<br>चतुर्दश समास्तत्र ह्युषित्वा मुनिवेषधृक् ॥३८॥<br>सीतामिषेण तं दुष्टं सकुलं नाशयाम्यहम् ।<br>एवं रामे प्रतिज्ञाते नारदः प्रमुमोद ह ॥३९॥<br>प्रदक्षिणत्रयं कृत्वा दण्डवत्प्रणिपत्य तम् ।<br>अनुज्ञातश्च रामेण ययौ देवगतिं मुनिः ॥४०॥<br>संवादं पठति शृणोति संस्मरेद्वा<br>यो नित्यं मुनिवररामयोः स भक्त्या ।<br>सम्प्राप्नोत्यमरसुदुर्लभं विमोक्षं<br>कैवल्यं विरतिपुरःसरं क्रमेण ॥४१॥नारदजीके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसका-<br>कर कहा ॥३५॥ “नारदजी ! सुनिये, क्या कोई<br>ऐसी बात भी है जिसे मैं न जानता होऊँ ? मैंने<br>पहले जो कुछ प्रतिज्ञा की है वह मैं निस्सन्देह पूर्ण<br>करूँगा ॥३६॥ किन्तु कालक्रमसे जिन-जिनका प्रारब्ध<br>क्षीण होता जायगा उन-उन दैत्योंको ही मारकर मैं क्रमशः<br>पृथिवीका भार उतारूँगा ॥३७॥ रावणका वध करने<br>के लिये मैं कल दण्डकारण्यको जाऊँगा और वहाँ<br>चौदह वर्ष मुनिवेष धारण कर रहूँगा ॥ ३८ ॥ उस<br>दुष्टको सीता-हरणके मिषसे मैं कुटुम्बके सहित नष्ट<br>कर दूँगा।”<br>रामचन्द्रजीके इस प्रकार प्रतिज्ञा करनेपर नारदजी<br>अति प्रसन्न हुए ॥३९॥ तदनन्तर उन्होंने रामजीकी<br>तीन परिक्रमाएँ कीं और उन्हें दण्डवत्-प्रणाम कर उनकी<br>आज्ञा ले आकाश-मार्गसे देवलोकको चले गये ॥४०॥<br>जो मनुष्य नारद और रामचन्द्रजीके इस संवादको<br>नित्य भक्तिपूर्वक पढ़ता, सुनता या स्मरण करता है<br>वह वैराग्यपूर्वक क्रमशः देवताओंको दुर्लभ कैवल्य<br>मोक्षपद प्राप्त कर लेता है ॥४१॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीय सर्ग

राज्याभिषेककी तैयारी तथा वसिष्ठजी और रघुनाथजीका संवाद।

श्रीमद्महादेव उवाच
अथ राजा दशरथः कदाचिद्रहसि स्थितः ।<br>वसिष्ठं स्वकुलाचार्यमाहूयेदमभाषत ॥ १ ॥<br>भगवन् राममखिलाः प्रशंसन्ति मुहुर्मुहुः ।<br>पौराश्च निगमा वृद्धा मन्त्रिणश्च विशेषतः ॥ २ ॥<br>ततः सर्वगुणोपेतं रामं राजीवलोचनम् ।<br>ज्येष्ठं राज्येऽभिषेक्ष्यामि वृद्धोऽहं मुनिपुङ्गव ॥ ३ ॥<br>भरतो मातुलं द्रष्टुं गतः शत्रुघ्नसंयुतः ।<br>अभिषेक्ष्ये श्व एवाशु भवांस्तच्चानुमोदताम् ॥ ४ ॥<br>सम्भारः सम्भ्रियन्तां च गच्छ मन्त्रय राघवम् ।<br>उच्छ्रीयन्तां पताकाश्च नानावर्णाः समन्ततः ॥५॥श्रीमहादेवजी बोले-एक दिन एकान्तमें बैठे हुए<br>राजा दशरथने अपने कुल-पुरोहित वसिष्ठजीको<br>बुलाकर कहा ॥१॥ “भगवन् ! सभी पुरवासी; शास्त्रज्ञ,<br>बड़े-बूढ़े और मन्त्रिजन रामकी विशेषतया बारम्बार<br>प्रशंसा किया करते हैं ॥२॥ इसलिये हे मुनिश्रेष्ठ ! मेरा<br>विचार है कि मैं अपने सर्वगुणसम्पन्न ज्येष्ठ पुत्र कमल-<br>नयन रामको राज्यपदपर अभिषिक्त कर दूँ क्योंकि मैं<br>अब वृद्ध हो गया हूँ ॥३॥ इस समय भरत शत्रुघ्नके<br>साथ अपने मामाके यहाँ मिलने गया है, तथापि मैं<br>कल शीघ्र ही रामका राज्याभिषेक करना चाहता हूँ ।<br>इस विषयमें आप भी अपनी सम्मति दे दीजिये ॥४॥<br>हे मुनिश्रेष्ठ ! आप अभिषेककी सामग्री एकत्रित<br>कराइये और रघुनाथजीके पास जाकर उनको यथोचित<br>सम्मति दीजिये । इस समय नगरमें सब ओर रंग-बिरंगी