भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग २ ] अयोध्याकाण्ड ४७


प्रसङ्गात्सर्वमप्युक्तं न वाच्यं कुत्रचिन्मया ।<br>राज्ञा दशरथेनाहं प्रेषितोऽस्मि रघूद्वह ॥३३॥<br>त्वामामन्त्रयितुं राज्ये श्वोऽभिषेक्ष्यति राघव।<br>अद्य त्वं सीतया सार्धमुपवासं यथाविधि ॥३४॥<br>कृत्वा शुचिर्भूमिरायी भव राम जितेन्द्रियः ।<br>गच्छामि राजसान्निध्यं त्वं तु प्रातर्गमिष्यसि ॥३५॥रघुश्रेष्ठ ! इस समय प्रसंगवश मैने ये सब बातें आपसे कह दी हैं, मैं ऐसा और कहीं भी न कहूँगा । हे राघव ! महाराज दशरथने इस बातकी सूचना देनेके लिये कि कल वे आपको राजपद्पर अभिषिक्त करेंगे—मुझे आपके पास भेजा है । आज आप सीताके सहित विधिपूर्वक उपवास और शुद्धता तथा इन्द्रियजयपूर्वक पृथिवीपर शयन करें । अब मैं राजाके पास जाता हूँ, आप कल प्रातःकाल वहाँ पधारें"॥ ३३–३५॥
इत्युक्त्वा रथमारुह्य ययौ राजगुरुर्द्रुतम् ।<br>रामोऽपि लक्ष्मणं दृष्ट्वा प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥३६॥<br>सौमित्रे यौवराज्ये मे श्वोऽभिषेको भविष्यति ।<br>निमित्तमात्रमेवाहं कर्ता भोक्ता त्वमेव हि ॥३७॥<br>मम त्वं हि बहिःप्राणो नात्र कार्या विचारणा ।<br>ततो वसिष्ठेन यथा भाषितं तत्तथाकरोत् ॥३८॥ऐसा कह राजपुरोहित वसिष्ठजी रथपर चढ़कर तुरन्त ही चले गये । तब रामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीकी ओर देखकर हँसते हुए कहा—॥ ३६॥ "हे सुमित्रानन्दन ! कल मेरा युवराज-पदपर अभिषेक होगा, सो मैं तो केवल निमित्तमात्र ही होऊँगा, उसके कर्त्ता-भोक्ता तो तुम्हीं होगे ॥ ३७॥ क्योंकि मेरे बाह्यप्राण तो तुम्हीं हो—इसमें कोई विशेष सोच-विचारकी आवश्यकता नहीं है।" तदनन्तर वसिष्ठजी जैसा कह गये थे रघुनाथजीने वैसा ही किया ॥३८॥
वसिष्ठोऽपि नृपं गत्वा कृतं सर्वं न्यवेदयत् ।<br>वसिष्ठस्य पुरो राज्ञा ह्युक्तं रामाभिषेचनम् ॥३९॥<br>यदा तदैव नगरे श्रुत्वा कश्चित्पुमान् जगौ ।<br>कौसल्यायै राममात्रे सुमित्रायै तथैव च ॥४०॥इधर वसिष्ठजीने भी राजा दशरथके पास आकर जो कुछ किया था सो सब सुना दिया । जिस समय महाराज दशरथ वसिष्ठजीसे रामचन्द्रजीके अभिषेकके विषयमें कह रहे थे उसी समय किसी पुरुषने यह समाचार सुनकर सम्पूर्ण नगरमें सुना दिया और राममाता कौसल्या तथा सुमित्राको भी यह सूचना दे दी ॥ ३९–४० ॥
श्रुत्वा ते हर्षसम्पूर्णे ददतुर्हारमुत्तमम् ।<br>तस्मै ततः प्रीतमनाः कौसल्या पुत्रवत्सला ॥४१॥<br>लक्ष्मीं पर्यचरद्देवीं रामस्यार्थप्रसिद्धये ।<br>सत्यवादी दशरथः करोत्येव प्रतिश्रुतम् ॥४२॥<br>कैकेयीवशगः किन्तु कामुकः किं करिष्यति ।<br>इति व्याकुलचित्ता सा दुर्गां देवीमपूजयत् ॥४३॥उन दोनोंने सुनते ही अति हर्ष-पूर्ण हो उसे एक अत्युत्तम हार दिया । तदुपरान्त पुत्रवत्सला कौसल्याने रामचन्द्रजीकी इष्ट-सिद्धिके लिये लक्ष्मीदेवीका पूजन किया 'राजा दशरथ सत्य-वादी हैं और उनके विषयमें यह प्रसिद्ध है कि वे अपनी प्रतिज्ञाका पालन करते हैं ॥ ४१--४२ ॥ किन्तु वे कामी और कैकेयीके वशीभूत हैं; ऐसी अवस्था में क्या वे इस प्रतिज्ञाको पूर्ण कर सकेंगे ?' इस प्रकारकी चिन्तासे व्याकुल होकर वह दुर्गादेवीका पूजन करने लगीं ॥ ४३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे देवा देवीं वाणीमचोदयन् ।<br>गच्छ देवि भुवो लोकमयोध्यायां प्रयत्नतः ॥४४॥<br>रामाभिषेकविघ्नार्थं यतस्व ब्रह्मवाक्यतः ।इसी समय देवताओंने सरस्वतीदेवीसे आग्रह किया कि "हे देवि ! तुम युक्तिपूर्वक भूलोकमें अयोध्यापुरीमें जाओ ॥ ४४ ॥ और वहाँ ब्रह्माजीकी आज्ञासे रामचन्द्रजीके राज्याभिषेकमें विघ्न उपस्थित