अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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.सर्ग ३] अयोध्याकाण्ड ५५
| सुमन्त्र उवाच.<br>अश्रुत्वा राजवचनं कथं गच्छामि भामिनि ।<br>तच्छ्रुत्वा मन्त्रिणो वाक्यं राजा मन्त्रिणमब्रवीत् ॥४६॥<br>सुमन्त्र रामं द्रक्ष्यामि शीघ्रमानय सुन्दरम् ।<br>इत्युक्तस्त्वरितं गत्वा सुमन्त्रो राममन्दिरम् ॥४७॥<br>अवारितः प्रविष्टोऽथ त्वरितं राममब्रवीत् ।<br>शीघ्रमागच्छ भद्रं ते राम राजीवलोचन ॥४८॥<br>पितुर्गेहं मया सार्धं राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति ।<br>इत्युक्तो रथमारुह्य सम्भ्रमाच्चरितो ययौ ॥४९॥<br>रामः सारथिना सार्धं लक्ष्मणेन समन्वितः ।<br>मध्यकक्षे वसिष्ठादीन् पश्यन्नेव त्वरान्वितः ॥५०॥<br>पितुः समीपं सङ्गम्य ननाम चरणौ पितुः ।<br>राममालिङ्गितुं राजा समुत्थाय ससम्भ्रमः ॥५१॥<br>बाहू प्रसार्य रामेति दुःखान्मध्ये पपात ह ।<br>हाहेति रामस्तं शीघ्रमालिङ्ग्याङ्के न्यवेशयत् ॥५२॥<br>राजानं मूर्च्छितं दृष्ट्वा चुक्रुशुः सर्वयोषितः ।<br>किमर्थं रोदनमिति वसिष्ठोऽपि समाविशत् ॥५३॥<br>रामः पप्रच्छ किमिदं राज्ञो दुःखस्य कारणम् ।<br>एवं पृच्छति रामे सा कैकेयी राममब्रवीत् ॥५४॥<br>त्वमेव कारणं ह्यत्र राज्ञो दुःखोपशान्तये ।<br>किञ्चित्कार्यं त्वया राम कर्तव्यं नृपतेर्हितम् ॥५५॥<br>कुरु सत्यप्रतिज्ञस्त्वं राजानं सत्यवादिनम् ।<br>राज्ञा वरद्वयं दत्तं मम सन्तुष्टचेतसा ॥५६॥<br>त्वदधीनं तु तत्सर्वं वक्तुं त्वां लज्जते नृपः ।<br>सत्यपाशेन सम्बद्धं पितरं त्रातुमर्हसि ॥५७॥<br>पुत्रशब्देन चैतद्धि नरकात्त्रायते पिता ।<br>रामस्तयोदितं श्रुत्वा शूलेनाभिहतो यथा ॥५८॥<br>व्यथितः कैकेयीं प्राह किं मामेवं प्रभाषसे । | **सुमन्त्र बोले-**हे भामिनि ! महाराजकी आज्ञा पाये बिना मैं कैसे जा सकता हूँ ? मन्त्रीका यह वचन सुनकर महाराज बोले—॥४६॥ "सुमन्त्र ! मैं मनोहर-मूर्ति रामको देखूँगा। तुम उन्हें शीघ्र ही ले आओ।” राजाके ऐसा कहते ही सुमन्त्र तुरन्त रामके महलको गये ॥ ४७ ॥ और बिना रोक-टोकके तुरन्त भीतर जाकर रामसे कहा—"कमल-नयन राम ! तुम्हारा कल्याण हो, तुम शीघ्र ही मेरे साथ पिताजीके घर चलो, महाराज तुम्हें देखना चाहते हैं।" यह सुनते ही राम चकित-से होकर तुरन्त ही रथपर चढ़कर चले ॥ ४८-४९ ॥ सारथी और लक्ष्मणके सहित भगवान् रामने मध्यद्वारपर विराजमान वसिष्ठादि गुरुजनोंका केवल दर्शनमात्रसे ही सत्कार कर जल्दीसे पिताजीके पास पहुँच उनके चरणोंमें प्रणाम किया । उस समय रामको गले लगानेके लिये ज्यों ही उठकर महाराज दशरथने आवेगके साथ हाथ बढ़ाये कि वे बीचहीमें दुःखपूर्वक 'हा राम ! हा राम !' कहते हुए गिर पड़े । तब रामचन्द्रजीने हाहाकार करते हुए अति शीघ्रतासे उन्हें गले लगाकर अपनी गोदमें बैठा लिया ॥ ५०-५२ ॥<br><br>महाराजको मूर्च्छित देखकर रनिवासकी समस्त महिलाएँ रोने लगीं । तब यह सोचकर कि 'यह रुदन क्यों हो रहा है ?' वहाँ वसिष्ठजी भी चले आये ॥ ५३ ॥ भगवान् रामने कैकेयीसे पूछा—"महाराजके इस दुःखका क्या कारण है ?" उनके इसप्रकार पूछनेपर कैकेयी बोली—॥५४॥ "हे राम ! महाराजके इस दुःखके कारण तुम्हीं हो; तुम्हें उनके दुःखके शान्त करनेके लिये उनका कुछ प्रिय कार्य करना होगा ॥ ५५ ॥ तुम सत्यप्रतिज्ञ हो, महाराजको भी सत्यवादी बनाओ । उन्होंने प्रसन्न होकर मुझे दो वर दिये हैं ॥ ५६ ॥ किन्तु उनकी सफलता तुम्हारे ही अधीन है । महाराजको तो तुमसे कहनेमें संकोच मालूम होता है; किन्तु तुम्हें सत्यपाशमें बँधे हुए अपने पिताजीकी अवश्य रक्षा करनी चाहिये ॥ ५७ ॥ क्योंकि 'पुत्र' शब्दका अभिप्राय ही यह है कि पिता-की नरकसे रक्षा की जाय ।”<br><br>कैकेयीकी ये बातें सुनकर रामने मानों शूलसे विद्ध हुएके समान व्यथित होकर कहा—"मातः ! आज |