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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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३२६ [ पाँचवीं पञ्चिका इसमें भी 'महद्' है। यह भी आठवें दिन का रूप है। यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इसके द्वारा प्रतिष्ठित करके वह सवन को थामे रहता है गिरने नहीं देता । दिवश्चिद्दस्य वरिमा वि पप्रथ......( ऋ० १।५५ ) इस सूक्त में "इन्द्र' न महा" में महद् शब्द है यह आठवें दिन का रूप है। यह जगती छन्द में है। इस त्र्यह का मध्य सवन का वाहक गायत्री छन्द है। जो छन्द सवन का वाहक होता है उसी में निविद् रक्खा जाता है। इसलिये निविद् जगती छन्द में है। अब मिथुन सूक्त पढ़ते हैं। त्रिष्टुभ् भी और जगती भी । पशु मिथुन हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये 'महद्वत्' सूक्त पढ़े जाते हैं। महद् अन्तरिक्ष है। अन्तरिक्ष की प्राप्ति के लिये यह सूक्त पढ़े जाते हैं। पाँच पाँच सूक्त पढ़े जाते हैं, पाँच पदों की पंक्ति होती है। यज्ञ पाँच भाग वाला है। पशु भी पाँच भाग वाले होते हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये । पाँच पाँच कर दस होते हैं। यह दसवाली विराट् है। अन्न विराट् है। पशु अन्न हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये । विश्वो देवस्य नेतुः ( ऋ० ५।५०।१ ) तत्संवितुर्वरेण्यम् आविश्चदेव सत्पतिम् । (ऋ० ५।८२।७ ) यह वैश्वदेव शस्त्र के प्रतिपद् और अनुचर हैं। यह बृहत छन्द में हैं और आठवें दिन के रूप हैं। सविता के निविद् यह हैं— हिरण्यपाणिमूतये (ऋ० १।२२।५-७ )