भारतकोश
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 292 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 126

११२ अकबर बीरबल विनोद अब एक युक्ति और बाकी है, यदि काम में लाई जाय तो सम्भव है कि उसका पता चल जाय ।” उम्मीदवार ने कहा-“पृथ्वीनाथ ! यदि वह किसी समय स्वयं आपसे आ मिले तो फिर क्या करेंगे, उसे रक्खेंगे वा कोरा लौटा देंगे ?” बादशाह बोला-“हाँ, मैं उसके लिये बड़ा उत्सुक हो रहा हूँ। तब नये दीवान ने कहा-“गरीबपरवर मैं उसका पता जानता हूँ। बादशाह बोला-“यदि तुम उसको मिला दोगे तो मैं तुमसे बहुत प्रसन्न होऊँगा ।” नये दीवान को जब भली- भाँति विदित हो गया कि बादशाह को बीरबल-प्राप्ति की बड़ी उत्सुकता है तो अपना साफा ऊपर को खिसकाते हुए अपनी ढकी आँखों को बाहर निकाला ! और पाजामा और जामा दोनों उतार कर अलग रख दिया। नकली दाढ़ी उतार फेंकी। तब वह खासा बीरबल हो गया। बहुत दिनों के बिछुड़े बीरबल को प्राप्त कर दरबारी गदगद हो गये बादशाह का तो क्या कहना, वह मारे आनन्द के विह्वल हो गया। सब तरफ से वाह वाही के शब्द आने लगे। बादशाह के पूछने पर बीरबल ने अपने गुप्त बास का इतिहास इस प्रकार वर्णन शुरू किया-“पृथिवीनाथ ! आपके पास से जाने के पश्चात् मैं एक मास तक घर पर बालबच्चों के साथ बिताया और सब से बराबर मिलता जुलता रहा, बाद को शहर छोड़कर बाहर चला गया और गुप्त रूपसे रहने लगा। मैं रात्रि में नगर रक्षा के निमित्त भेष बदलकर गस्त लगाया करता था, इतने दिनों के अन्तर्गत मैंने कितने

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · पृष्ठ 126, कुल 292 में से · BharatKosha