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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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अकबर बीरबल विनोद १४० “आप लोगों में कोई ऐसा भी बीर है जो इस जलकुण्ड में धँसकर एक पहर रात्रि तक खड़ा रहे।” किसी को बादशाह के प्रश्न का उत्तर देने का शाहस न हुआ, आखिरकार फिर बादशाह ने एक दूसरी घोषणा की। उसने कहा-“जो कोई आज इस तालाब के जल में गले तक डूबकर रात्रि भर खड़ा रहेगा, उसको पचास हजार रुपये बतौर पारितोषिक के दिये जायेंगे।” फिर भी कोई मनुष्य उस जान लेवा देवा कर्तव्य के लिये उद्यत न हुआ। तब उसी गिरोह का एक बरहमन जो वस्त्रा- भाव के कारण अर्धनग्न हो रहा था, बढ़कर सबसे आगे आया। उसने अपने मन में सोचा-“रोज रोज की यातना से एक दिन में ही कष्ट सहकर प्राण त्याग देना उत्तम है, मैं किसी दिन भर पेट अन्न खाकर नींद भर नहीं सोता, रात दिन गरीबी की आग में जला करता हूँ, तो क्यों न इसी बहाने प्राण त्याग दूँ ! यदि ईश्वर सहायक हुआ तब तो कहना ही क्या है। इस पुरस्कार से आजन्म सुखपूर्वक निर्वाह करूंगा।” फिर बादशाह से अपना दोनों हाथ जोड़कर बोला-“पृथिवीनाथ ! मुझे आपकी शर्ते मंजूर हैं।” बादशाह ने कहा-“अच्छी बात है, यदि तू अपने कौल का सच्चा निक- लेगा तो मैं तुझे पचास हजार रुपयों के अतिरिक्त बहुत सा वस्त्राभूषण भी इनाम में दूँगा।” तालाब के चारों तरफ बादशाह ने संतरियों का पहरा बैठा दिया। फिर वह दीन ब्राह्मण नंग धड़ंग होकर उस जल में पैठा और राम राम करके सारी रात बिता