अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७५ अकबर बीरबल विनोद तीन दिन में फिर आपके नख पहले के समान उग आयेंगे। हाँ साथ ही इसके एक बात और है, मेरी दवा के नुसखे कुछ ऐसे आसान नहीं हैं, उनके एकत्रित करने में बड़ी कठिनता होगी । बादशाह बोला—“कोई कठिनता नहीं है; क्या मैं इतना बड़ा बादशाह होकर दवाओं को संग्रह न कर सकूँगा ?” वीर- बल ने कहा—“चाहे जो हो; संग्रह करना आपका काम है। मैं तो ऐसा कहता भी नहीं हूँ कि आप उसे संग्रह नहीं कर सकेंगे । परमात्मा की कृपा से सब कुछ हो सकता है। केवल आपको एक शर्त लिखनी पड़ेगी कि अगर एक मास के अन्तर्गत आप दवाओं का संग्रह न कर सकेंगे तो फिर आपका मुझपर कोई दावा नहीं रह जायगा और आपके यहाँ जितने हकीम और वैद्य कैदी हैं सबको छोड़ देना पड़ेगा। हाँ मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि जब कभी आप मेरी दवा मँगवा देंगे मैं बिला उज्र आपकी खिदमत में हाजिर होऊँगा ।” बादशाह ने अपने मन में अनुमान किया-“यह हकीम पहले पहल इस नगर में आया है इसलिये इसको मेरे खजाने का ज्ञान नहीं है। समझता है कि इतना द्रव्य बादशाह न खर्च कर सकेंगे कि जिससे दवा खरीदी जा सके। भला ऐसी वह कौनसी दवा होगी कि जिसे मैं न खरीद सकूँगा ?” वह अपने मन में खूब संकल्प विकल्प कर अपने को दृढ़ बना कर बीर- बल के कथनानुसार प्रतिज्ञा पत्र लिख दिया और फिर हकीम से दवा का नाम बतलाने की प्रेरणा की । बीरबल को भीतर २ बड़ी प्रसन्नता हुई । उसने जान लिया कि अब निरपराध हकीम और वैद्यों के मुक्त होने का समय नजदीक