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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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२६१ अकबर बीरबल विनोद हामी भर ली। वह उत्तर देने में चूक गया। बीरबल में इस बात की बड़ी विशेषता थी कि वह भरसक अपनी बातों को निभाने की कोशिश करता था। इस बात को बादशाह भी भलीभाँति जानते थे। "बीरबल ने मेरा निमन्त्रण स्वीकार कर लिया।" इस बात को सोचकर बादशाह को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे अपने बड़े २ मुसलमान दरबारियों को इसकी बधाई भेज दी। वे मुसलमान दरबारी भी ऐसा कह २ कर फूले नहीं समाते थे कि कल बीरबल मुसलमानी मजहब स्वीकार करेगा। इससे बढ़कर उन मुसलमान दरबारियों को और कौनसी शुभ सूचना हो सकती थी। दो घण्टे की कड़ी परिश्रम के पश्चात् बीरबल अपने कामों से अवकाश पाकर वही लेट गया। उसी समय उसके साथ का एक हिन्दू कर्मचारी बोला-“दीवान जी! आज आपने बिना विचार किये ही बादशाह के सामने ऐसी कठिन प्रतिज्ञा कैसे कर ली।" अब बीरबल का होश ठिकाने आया, उसके आँखों के सामने अन्धेरा छा गया। मन ही मन विचार करने लगा-“तो क्या कल मुझे मुसलमान बनना पड़ेगा? क्या मेरी इतनी दिनोंकी सब कीर्तियोंके विलीन होनेका समय आ गया? मैं अपने जात बिरादरी के लोगों की गालियाँ और तानाजनी को कैसे सहन कर सकूँगा। बादशाह के साथ भोजन कर लेने के पश्चात् हिन्दू जनता को फिर मैं अपना कौनसा मुँह दिखलाऊँगा।" ऐसी ही ऐसी अनेकों कल्पनाएँ एक साथ ही उत्पन्न होकर बीरबल को हतबुद्धि बना दीं और उसका दिमाग ऐसा व्यथित हो गया कि फिर काम