अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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बीरबल का और दिनों से अधिक सत्कार किया। बड़े २ अमीर मुसलमानों ने भी उठ २ कर बीरबल का स्वागत किया। मारे खुशी के बादशाह ने बीरबल को अपनी बगल में बैठने का प्रबंध किया। जब यह सब हो चुका तो बीरबल विनम्रता पूर्वक बोला-“पृथिवीनाथ ! मैं तो भोजन करने आया ही हूँ; परन्तु आपसे थोड़ी आग्रह है। यदि मुझे अपने साम्प्रदायिक नियम के अनुसार भोजन करने को अनुमति दी जावे तो अति उत्तम हो।” बादशाह ने कहा-“अच्छी बात है, तुम अपने सम्प्रदाय के नियमानुसार ही भोजन करो।” बीरबल बोला-“तो इन सब थालियों पर थोड़ा २ पानी छिड़कना पड़ेगा। यदि मैं ऐसा करूँ और कोई नाराज हो तब क्या करना होगा। आप पहले ही से इसपर विचार कर लीजिये। बादशाह बोले-“तुम अपने सम्प्रदाय की रस्म पूरी करके भोजन करो। इसमें हम सबों को कोई आपत्ति न होगी।” फिर बादशाह ने अपने अन्य मुसलमान मेजमानों की तरफ दृष्टि फेर कर देखा, सबों ने अपनी गर्दन हिलाकर बादशाह का फर्मान स्वीकार किया। तब बीरबल सबको वाक्यबद्ध करके मस्त हो गया और उसकी साम्प्रदायिक प्रथा शुरू हुई। एक कटोरोमें पानी भरकर उसी सूअर के बाल की कूँची को उसमें डुबा २ कर खाद्य पदार्थ से सुसज्जित थालियों पर छिड़कने लगा। सब थालियों पर छींटे डाल चुकने के पश्चात् बीरबल ने बादशाह की थालीपर भी थोड़ा सा पानी छिड़क दिया। एक अमीर जो बाद- शाहके पास बैठा हुआ बीरबलका सारा चरित्र देख रहा था बोला “ओफ ! यह, तो बड़ा कठिन हुआ, यह कूची तो बाल की है।”