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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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भूमिका प्राचीनकाल के राजदरबारों में; जहाँ सब प्रकार के गुणियों का आदर रहता था वहाँ एकाध ऐसे भी हास्यरस- कुशल कुशाग्रबुद्धि पुरुषरत्नों, का प्रवेश रहता था जो समय समय पर विलक्षण बुद्धि एवं वचनचातुरी से राजाओं को मोह लेते थे और अपनी वचनचातुरी से स्वामी को वश में कर लेते थे। राजा बीरबल और बादशाह अकबर का ऐसा ही सम्बन्ध रहा है। अकबर के दरबार में वा यों कहिये कि अकबरी राजसभा के नौरत्नों में बीरबल कोहनूर हीरा थे। लड़कपन से ही बीरबल अकबर के साथ थे और दोनों में ऐसा हँसी मजाक हुआ करता था जैसा दो लँगोटिये यारों में होता है। बीरबल जी केवल हँसोड़ थे सो नहीं वे अच्छे शूर, सामन्त, कवि, पण्डित और सभाचातुर वीरनर थे। बीरबल दानी भी बड़े थे और हाजिरजवाबी में तो अपना सानी नहीं रखते थे। बादशाह अकबर बीरबल को प्राणों से भी अधिक प्रिय मानते थे और क्षण भर भी पृथक रहना नहीं चाहते थे। इसमें किंचितमात्र सन्देह नहीं कि अकबर बीरबल के मजाक बड़े मौके मार्के के और गुदगुदाने वाले होते थे। खेद है कि इनके प्रचलित मजाकों में कुछ मजाक कल्पित सन्निवेशित कर दिये गये हैं। मुल्ला दोप्याजे का नाम भी कल्पित ही सिद्ध हुआ है।