भारतकोश
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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[Header] ४१ \t\t\t अकबर बीरबल बिनोद

देखिये वह सातवें खण्ड की खिड़की पर बैठी हुई परी हमलोगों की तरफ देख रही है, उसकी दासी पीछे से पान बीड़ा थमा रही है। यह दासी क्या है मानो सुन्दरता की सीमा है, इसकी जोड़ की सारे महल में एक भी बेगम नहीं है । वाह परी का क्या कहना ! जिस की दासी ऐसी है उसके मालकिन की प्रशंसा करना तो मानो सूर्य को दीपक दखाना है। बरंबार उँगली का संकेत कर उसे दिखलाने लगा फिर भी कुछन देख पड़ने पर बादशाह ताज्जुबसे बोला- “आप न जाने क्या देख रहे हैं; मुझे तो कुछ भी दिखलाई नहीं पड़ता ।” बीरबल बोला-“यदि आपको मेरे कहने पर विश्वास नहीं पड़ता तो आप अपने दीवान और अन्य मुसाहिबों से पूछ लीजिये । वे लोग तो पहले ही से बीर- बल के पंजे में पड़ चुके थे, एक स्वर से परी का दीख पड़ना स्वीकार किया और बादशाह को उसके न दिखाई पड़ने पर आश्चर्य्य प्रकट करने लगे। बादशाह विचार सागर में लहरें मार रहा था, उसका मन नितान्त चंचल हो रहा था। इसी बीच बीरबल ने कहा-“पृथ्वीनाथ ! मैं पहले आपसे एक बात कहना भूल गया था, वह यह कि स्वर्गीय वस्तुएँ यहाँ के निवासियों को बड़ी कठिनता से दीख पड़ती हैं कारण कि आजकल अधिकतर लोग वर्णशंकर हो गये हैं और वर्णशंकरों को स्वर्गीय वस्तुएँ स्वप्न में भी नहीं दृष्टिगत होतीं; प्रत्यक्ष की तो बात ही निराली है। आप को खूब दृष्टि गड़ाकर ध्यानपूर्वक देखना चाहिये । देखिये दुइज का चाँद थोड़े अर्से के लिये अवश्य उदय होता है