अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअकबर बीरबल विनोद ५४ को देकर बीरबल बोला-"इसे बेचकर चौथे दिन सबके साथ मूल्य लेकर हाजिर होना।" इस प्रकार यत्रतत्र कुप्पों को बेचने और धन संग्रह करने में चारो व्योपारी जा लगे। जब रुपया जमा करने की निश्चित तिथि आई तो वे सब बिक्री के रुपये लेकर बीरबल के पास आये। बीरबल ने तीन व्यापारियों का द्रव्य सहेज लिया जब चौथे को (प्रतिवादी की) बारी आई तो उसका द्रव्य सहेजते हुये बोला-"तुम्हारे कुप्पे में अन्य व्योपारियों से अधिक घी था यानी तीन में तो एक एक मन था, परन्तु तुम्हारे कुप्पे में सवा मन था।" बीरबल की यह बात सुनकर प्रतिवादी घबड़ा गया और बोला-"हुजूर क्या कह रहे हैं, मेरे कुप्पेमें भी एकही मन था। गरमाते और तौलते समय उस जगह मेरे घर के और प्राणी भी मौजूद थे, आपको विश्वास न हो तो उनको बुलवाकर जाँच कर लें, घी की वजन सबके सामने की गई थी।" बीरबल अपने एक सेवक के कान में कुछ समझाकर बोला-"तू उसके लड़के से जाकर कहो कि तुम्हारा बाप कुप्पे से निकली अशर्फी को तुरत माग रहा है, तू उसे अभी लेकर मेरे साथ चल।" वह कर्मचारी जाकर व्योपारी के लड़के से बोला-"तेरा पिता बादशाह की सभा में बैठा है घी के कुप्पे से निकली अशर्फी लेकर तुझे बुलाया है, लड़का साथ हो लिया। अपने पुत्र को एकाएक दर्बार में उपस्थित देख व्योपारी चिन्ताग्रस्त हुआ, परन्तु विवश था, बीरबल के सामने उससे कुछ कह भी नहीं सकता था ! बीरबलने लड़के