भारतकोश
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 292 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

५७ अकबर बीरबल विनोद तरक्की पर रहेगा ।'' फिर लड़के को चिताकर उसे सदैव सच बोलने की शिक्षा देकर बिदा किया। अन्य तीनों व्योपारी भी बीरबल की आज्ञा पाकर घर लौट गये।

आधी दूर धूप आधी दूर छाया।

एक दिन का हाल है कि बादशाह बीरबल पर खफा होकर उसको अपने नगर से बाहर निकाल दिया। बीरबल हरहालत में खुश रहनेवाला था, वह नगर से बाहर किसी ग्राम में जा बसा। इस प्रकार बास करते २ कई महीने व्यतीत होगये न बादशाह ने उसे बुलवाया और न वह स्वयं आया। समय समय पर बादशाह बीरबल को याद कर बड़ी चिन्ता करता, परन्तु उसका कहीं पता ठिकाना न मिलने के कारण लाचार था। जब किसी प्रकार बीरबल का पता न चला तो ढूँढ़ने के लिये बहुतेरे कर्मचारियों को गाँवों में भेजा, फिर भी बीरबल का अनुसन्धान न हो सका। तब बादशाह उसको ढूँढ़ने की एक नई तरकीब निकाली। नगर २ में ढिंढोरा फिरवा दिया कि जो सख्स-“आधी दूर धूप और आधी दूर छाया” में होकर मेरे पास आवेगा उसे एक हजार रुपये पारितोषिक दिये जायेंगे ।” बहुतों ने पारितोषिक पाने की चेष्टा की, परन्तु किसी के दिमाग में “आधी दूर धूप आधी दूर छाया” में होकर आने की युक्ति न सूझी। यह बात क्रमशः फैलते फैलते

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · पृष्ठ 71, कुल 292 में से · BharatKosha