भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 13

८ आल्हाखण्ड । सजि संयोगिनि गै पलमाँ इक बाँदियन हुकुम दीन फरमाय ॥ डोला लावो अब जल्दी सों बाँदिया चलीं हुकुमकोपाय ६४ लाई डोला सो जल्दी सों औ त्यहि खबरि सुनाई जाय॥ सुनिकै बातें सो बांदी की मनमें श्रीगणेशको ध्याय ६५ सुमिरि भवानी शिवशंकरको औ सूर्यन को माथ नवाय ॥ बैठी डोला में संयोगिनि सीता रामचरण मनलाय ६६ चारि कहरवा मिलिडोला लै तुरतै चले पूर्व दिशिधाय ॥ आगे डोला संयोगिनि को पांछे चलीं सहेली जाँय ६७ दौरति जावैं पुरवासी सब दासिन भीर भई अधिकाय ॥ चढ़िगे मंचन नर नारी सब राजन देखि देखि हर्षाय ६८ बड़ी भीर भय तब कनउज में औ तिल डरे भुईं ना जाय ॥ शोभा गावैं जो कनउज की तौफिरिएकसाल लगिजाय६६ डोला लैकै संयोगिनि का महरन तहाँ उतारा जाय ॥ जहँना बैठे सब राजा हैं एकते एक रूप अधिकाय ७० उतरिकै डोला सों संयोगिनि माला दहिन हाथ लै लीन्ह ॥ सुमिरिभवानीसुत गणेश को महिफिलमध्यगमनतबकीन्ह७१ बैठे राजा सब महिफिल में एक ते एक शूर सरदार ॥ कोउ कोउ राजा तीस बरसका कोउ कोउ वर्ष अठारहकप्यार७२ काले नीले पीले लाले उजले शोभा के अधिकाय ॥ जामा पहिरे रेशमवाले चम्चम् चमकि २ रहिजाँय ७३ सोहैं दुपट्टा तिन जामन पर गल में परे मोतियन हार ॥ रंगाविरंगी पगड़ी शिर पर तिनपर कलँगी करै बहार ७४ हाथ लगाये हैं मुच्छन पर दहिने परी ढाल तलवार ॥ ⁻ ० दिखावैं नहिं बैरी को ऐसे सबै शूर सरदार ७५