आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंयोगिनिस्वयम्बर। ३१ हमॉँ जमाँ औ गोबिंद राजा दोऊ समरधनी बलवान ॥ फिरि फिरि मारैं औ ललकारैं दोऊ एक बैस के ज्वान ७३ गदा बनेठी केर खिलारी करि पैंतड़ा लड़ैं मैदान ॥ बारु बराबरि प्राणन जानैं एकते एक बढ़े अभिमान ७४ हमॉँ जमाँ जब भाला मारैं गोबिंद राजा लेयँ बचाय ॥ मारैं गोबिंद तलवारी सों सोऊ लेयँ ढाल पर आय ७५ बड़ी लड़ाई भै गोबिंद कै हमरे बूत कही ना जाय ॥ जो हम गावैं विस्तारित करि तौफिरिएकसाललगिजाय७६ खैंचि सिरोही हमॉँ जमाँ ने मार्यो बीच गला को ताकि ॥ तबहीं शिर धरती माँ गिरिगा बोल्यो मारुमारु मुह हांकि७७ बिन शिर धड़ रणमाँ तब दौरा हाथ में लिये ढाल तलवार ॥ ज्यहि दिशिजावै रणमंडलमें त्यहिदिशिजूंझैंशूरअपार ७८ ब्याकुल क्षत्री चौगिर्दा ते बिन शिर लड़ै वीरबलवान ॥ शंका ब्यापी रण शूरन के कायर भागे छांड़ि परान ७६ नील कि झंडी ताहि छुवायो छुवतैं गिरा तुरत भहराय ॥ तौलौं डोला संयोगिनि का लैगे ग्यरा कोस पर जाय ८० तब महराजा कनउज वाला बोला सब सों बचन रिसाय ॥ नालति ऐसी रजपूती का औधिरकाल जिंदगी भाय ८१ डोला जाई जो दिल्लीमाँ तौ यश जाई सबै नशाय ॥ मानुष देही फिरि मिलिहै ना तातेखालौ लोह अघाय ८२ बीर बखानों दुर्योधन को ज्यहियशआपनलीनबचाय ॥ जो कछु भाखासो सब राखा औतजिदीन पुत्रधन भाय ८३ धन्य बखानों त्यहि रावण को ज्यहि हरिलीन रामकी नारि ॥ सम्मुख जूझी त्यहि रथ्यतिसब करिकै रामचन्द सों रारि ८४