भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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= आल्हाखण्ड । १४ तिनसों बोल्यो परिमालिक फिरि हमरी बात सुनो दोउ भाय ॥ दूध पूत औ धनदौलत के मालिक तुम्हीं बनाफरराय ६९ मीराताल्हन वनरस वाले तिनसों बोल्यो रजापरिमाल ॥ फौजनकेरे तुम मालिक हौ हमरे बचन करौ प्रतिपाल ७० नाई बारी को बुलवायो तिनसों कह्यो बचन समुझाय ॥ जाति बिरादर जहाँ हमरे हैं तिनका खबरि सुनायो जाय ७१ लरिका द्वारे परिमालिक घर ब्याहन योग भये हैं आय ॥ क्वारी कन्या जिनघर होवैं टीका तुरत देयँ पठवाय ७२ सुनिकै बातें परिमालिक की नाइन पतालगायो जाय ॥ दलपतिराजा ग्वालीयर का त्यहिफिरि टीका दीनपठाय ७३ देशराज औ बच्छराज को लैके पहुँचिगयो परिमाल ॥ द्यावलि विरमाँ दूनो कन्या इनको ब्याहिदीन नरपाल ७४ देशराज का द्यावलि सँगमें विरमाँ बच्छराज के साथ ॥ ब्याहिकै चलिभे परिमालिक फिरि मनमें सुमिरि भवानीनाथ ७५ दोनों बहुवन को सँग में लै मोहवे आयगये परिमाल ॥ खबरि जनायो यह सखियनने मल्हनावहुत भई खुशियाल ७६ दौरति आई फिरि द्वारे पर औ आरती उतारी आय ॥ बाँह पकरिलइ दोउ बहुवन की राखी रंगमहल में जाय ७७ हार नौलखा के लेबे को आयो रहै करिंगाराय ॥ स्वई हार लै रानी मल्हना औद्यावलिको दीन पहिराय ७८ दूसर हार और तैसे लै विरमागले दीन फिर डार ॥ अनँद बधैया बाजन लागी घर घर होयं मंगलाचार ७९ को गनि बरणै त्यहिसमया कै हमरे बूत कही ना जाय ॥ सुखमाँ सोयो परिमालिक फिरि मल्हना संग महल हर्षाय ८०