भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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२ आल्हखण्ड । ब्राह्मण कायथ मुसलमान ओ नौकर रहे बहुत अँगरेज ॥ काम देखिकै सब काहू को सोवैं नवल भवन तब सेज ४ को गति बरणै तिन मुंशीकै जिनको बढ़ो अमित परताप ॥ लाखन पुस्तक के ऊपरमाँ जिनके परै अबौलौग छाप ५ तिन सुत बाबू प्रागनरायण जिन मन शान्ति रही दर्शाय ॥ को गुण बरणै तिन बाबूके गाये कथा बहुत बढ़िजाय ६ छं० जिला जौन उन्नाम तासु पूरबदिशि माहीं । पांच कोस है ग्राम नाम पँड़री तिहिकाहीं ॥ किरपाशंकर मिश्र वृत्ति पण्डित की जाहीं । तिनसुत ललितेनाम ग्रन्थ निर्मापक आहीं ७ ते यश बरणैं अब जयचंद का लै कै रामचन्द्र का नाम ॥ प्रथम स्वयम्बर संयोगिनि का पाछे बरणौं युद्ध ललाम ८ सबकनवजियात्यहिकनउजमाँ बीचम बसै तहाँ नरपाल ॥ छूटि सुमिरनी गै ह्यांते अब सुनिये कनउज केर हवाल ६ अथ कथाप्रसंग ॥ जयचंद राजा कनउज वाला आला सकल जगत सिरनाम ॥ को गति बरणै त्यहिमंदिरकै सोहै सोन सरिस त्यहिधाम १ केसरि पोतो सब मंदिर है औछति लागि बनातन केर ॥ सुवा पहाड़ी तामें बैठे चकस गड़े बुलबुलन केर २ लाल औ मैनन कै गिनती ना तीतर घूमि रहे सब ओर ॥ पले कबूतर कहुँ घुटकत हैं कहुँ कहुँ नाचि रहे हैं मोर ३ लागि कचहरी है जयचंद के बैठे बड़े बड़े नरपाल ॥ बना सिंहासन है सोने का तामें जड़े जवाहिग लाल ४ तामें बैठो महराजा है दहिने धरे ढाल तलवार ॥