आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंयोगिनिस्वयम्बर । ३ जामा पहिरे रेशमवाला आला कनउज का सरदार ५ पाग बैंजनी शिरपर सोहै तापर कलँगी करै बहार ॥ कवि औ पण्डित बहु बैठे हैं भारी लाग राजदर्बार ६ नचै पतुरिया सन्मुख ठाढ़े ओढ़े काश्मीर कै सारि ॥ जूरा झलकै त्यहि सारी बिच काली नागिनिके अनुहारि ७ फूल चमेलिन के जूरा में नखतन सरिसकरैं उजियारि ॥ हरवा सोहै गल बेलाका छैला ताको रहे निहारि ८ बालाहालैं त्यहि कानन में गालन छुवै और टरिजाँय ॥ अद्भुत बेसरि स्वहै नाक में शोभा कही तासु ना जाय ६ डुलरी तिलरी पंचलरीलों सो गलबिच में करैं बहार ॥ बाजू सोहैं दोउ बाहुन में जोशन शोभाअमित अपार १० सोहैं कलाइन में ककना भल तामें चुरियाँ करैं बहार ॥ छल्ला सोहैं त्यहि अँगुरिन में ताको क्षत्री रहे निहार ११ सोने करगता तीन लरनको सो कम्मर में करै बहार ॥ कड़ा के ऊपर छड़ा बिराजैं तापर पायजेब झनकार १२ पैर जमावै कमर झुकावै अँगुरिन भाव बतावति जाय ॥ जौनि रागिनी जब वाजिबहै ताको तबै देय दर्शाय १३ जब दिशि जावति है राजाके पावै द्रव्य जाय हर्षाय ॥ माफी पाये है कनउज में लरिकातीनिसखिलौंखाँय १४ लाग अखाड़ा रजपूतन का शोभा कही बूत ना जाय ॥ खाये अफीमन के गोला बहु पलकैं मूंदैं औ रहिजाँय १५ उड़ै तमाखू बुटवल वाली धुवना सरग रहा मड़राय ॥ भाँग जमाये बहु बैठे हैं मनमाँ रहे रामयश गाय १६ त्यही समइया त्यहि अवसरमाँ राजै गयो सोच मनछाय ॥