श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
निवार्य त्रिजटानाम्नी विभीषणप्रियाऽनुगा। ताः सर्वा राक्षसीर्वग्दाद्वापयन्नाह सादरम् ॥१०१॥
न भीषयध्वं रुदतीं नमस्कुरुत जानकीम् सुचिह्नं राघवः स्वप्ने मया दृष्टोऽद्य जानकीम् ॥१०२॥
मोचयामास दृष्ट्वेमां लङ्कां हन्त्वा तु रावणम्। रावणो गोमयह्रदे तैलाभ्यक्तो दिगम्बरः ॥१०३॥
मयाऽद्य दृष्टः स्वप्ने हि तस्मादेनां न साहसम् कार्यं सेव्या सदा चेयं रामादभयदायिनी ॥१०४॥
युष्माभद्दुःखिता नेष्टा भयंयं चानायिष्यति। इति तत्रिजटावाक्यं श्रुत्वा तस्थुर्भयाकुलाः ॥१०५॥
तूष्णीमेव तदा माना दुःखान्किमिदुदाथ मा। इदानीमेव मरणं केनोपायेन मे भवेत् ॥१०६॥
दीर्घा वेणी ममान्यर्थमुद्बन्धाय भविष्यति। यन्मयाऽशौर्यवाक्यैर्लक्ष्मणस्ताडितः पुरा ॥१०७॥
तस्मादिनाः पीडयति भोक्ष्यते स्वकृतं मया। मया विनागः सौमित्रिर्नासितो गौतमीऽटे ॥१०८॥
प्रायश्चित्तं करिष्येऽद्य सस्य त्यक्त्वाज्यजीवितम्। एवं निश्चितबुद्धिं तां मग्नायाय जानकीम् ॥१०९॥
दृष्ट्वा मुनेर्वायुपुत्रो रामवृत्तं न्यवेदयत्। आभ्राकर्णानिगेमाच्च स्वसीतादर्शनावधि ॥११०॥
मविस्तारं क्रमेणैव सीतातोषाथमादरात्। सीता क्रमेण तन्मर्वं श्रुत्वा साश्चर्यमानसा ॥१११॥
कि मयेदं श्रुतं स्वप्मिन् व्यमो दृष्टोऽथवा निधि। येन मे कर्णपीयूषवचनं समुदीरितम् ॥११२॥
स दृश्यता महाभागः प्रियवादी ममाग्रतः। तच्छ्रुत्वा मन्पुत्रे गन्त्वा नत्वा नामनवीत्पुनः ॥११३॥
रामदूतो ददौ तस्यै राघवस्यांगुलायकम्। तां राममुद्रिकां दृष्ट्वा नत्वा नामब्रवीत्कपिम् ॥११४॥
सर्वं कथय तद्वृत्तं यथा दृष्टं त्वयाऽत्र हि। तदा तां सांस्वयामास रामो मन्स्कन्धसंस्थितः ॥११५॥
वानरैश्च समागत्य हन्त्वा रावणमाहवे। त्वां नेष्यति नय सानेत्यब्रवं दम वाक्पतः ॥११६॥
अंगुलियोंके संकेतसे सीताको डराने लगीं । ९८-१०० । उसी समय विभीषणकी प्रिया अनुगामना त्रिजटा राक्षसोंने उन सबको ऐसा करनेसे रोका और उन सबको समझाकर कहा कि इस रोती हुई जानकीजीको तुम लोग डराओ नहीं प्रत्युत नमस्कार करो । मैंने आज स्वप्नमें रामको सुन्दर चिह्नोंसे युक्त देखा है और यह भी देखा है कि उन्होंने जानकीको छुड़ाकर लङ्काको जलाया तथा रावणको मार डाला है। तेल लगाये हुए रावण गोबरके गड्ढेमें गिर गया है ॥ १०१-१०३ ॥ मैंने आज यह स्वप्न देखा है। इस कारण इन्हे सतानेका साहस नहीं करना चाहिए । रामसे अभय दिलानेवाली इस जानकीकी तुम्हें सेवा करना चाहिए । १०४ ॥ यदि तुम लोग इसे दुःख दोगी तो वह अप्रसन्न पान रामके द्वारा तुम्हें भयको प्राप्त होगी । त्रिजटाके इस वाक्यको सुनकर सब राक्षसियाँ व्याकुल होकर चुप हो गयीं । १०५ ॥ उन सबके चले जानेपर दुःखित होकर सीता धीरे-धीरे कहने लगीं कि इसी समय मेरा मरण किस उपायसे हो सकता है । १०६ ॥ हाँ, यह मेरे सिरकी दीर्घवेणी इसको दृढ़ फांसी लगानेके लिए बहुत अच्छा तरह काम आवगी । उस समय जो मैंने बचनरूपी बाणों-से लक्ष्मणको बींधा था । १०७ ॥ उसीके फलस्वरूप आज ईश्वर मुझे रुला रहा है। वह मैं अपने किये हुए कर्मोंका फल पा रही हूँ। मैंने गौतमी तटपर बिनाही अपराधके निर्दोष मुद्ध लक्ष्मणजी को धमकाया था ॥१०८॥ उसका मैं आज प्राण देकर प्रायश्चित्त करूंगी। इस प्रकार मरनेका निश्चय कियेहुए जानकीको देखकर वायुपुत्र हनुमान्ने धीरे-धीरे रामका वृत्तान्त सुनाना प्रारम्भ किया । उन्होंने रामके अयोध्यासे वनमें आगमनसे लेकर सीताको देखने तकका सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक क्रमसे ही सीताके सन्तोषके लिए सुना दिया। वह सब वृत्तान्त सुनकर सीता आश्चर्यचकित होकर सोचने लगीं कि क्या यह मैं कोई स्वप्न अथवा भ्रम देख रही हूँ अथवा रात्रिके समयका स्वप्न देख रही हूँ। जिसने मेरे कानोंके लिए अमृतके समान यह वचन सुनाया है । १०९-११२ ॥ वह प्रियवादी मेरे सामने आकर दर्शन दे । यह सुनते ही हनुमान् उनके सामने प्रकट हो गये और नमस्कार करके उन्हें रामका वृत्तान्त पुनः सुनाया । ११३ ॥ फिर विश्वास दिलानेके लिए रामकी अंगूठी निकाल-कर सीताको दी । रामकी मुद्रिकाको देख तथा नमस्कार करके सीता बोलीं ॥ ११४ ॥ हे कपि ! जैसा कि तुमने देखा है, सो सब हाल जाकर रामसे कह देना। तब हनुमान् सीताको आश्वासन देकर कहने लगे कि राम मेरे कन्धेपर सवार हो वानरसेनापतियोंके साथ यहाँ आकर युद्धमें रावणको मारेंगे और आपको