भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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८८ आनन्दरामायणे [ सर्ग २

दृष्ट्वा तं दुद्रुवुर्भर्त्तु भाषितुं वनरक्षकाः । राक्षसानागतान् दृष्ट्वा वृक्षान्नोत्पाटयत्कपिः ॥१३५॥ उत्पाट्याशोकवनिकां निर्वृक्षामकरोत्क्षणात् । सीताश्रयतरुं त्यक्त्वा फलं मूलञ्च चक्षाम सः ॥१३६॥ चैत्यं चैत्यप्रासादं हत्वा तद्रक्षकान् सतान् । ततस्ता राक्षसाः सर्वा वनभङ्गं निवेद्य च ॥१३७॥ अपृच्छञ्जानकीं मन्दाः कोऽयं कस्य कुतस्त्विह । ताः सर्वा जानकी प्राह राक्षसाः कामरूपिणः ॥१३८॥ विचरंति मुदा भूम्यां वेद्यन्तं भित्तुमाश्रिताः । तदा हृता पञ्चवट्यां रावणेन हि तडनात् ॥१३९॥ तस्माज्ज्ञेयस्तु युष्माभिः कोऽयं यो पृच्छतेद्य किम्। इति दम्भाद्वचः श्रुत्वा राक्षस्यो भयविह्वलाः ॥१४०॥ दशाननं हि शरणं ययुः शीघ्रं निशाचराः । एतस्मिन्नन्तरे प्रातर्गन्धर्वे कश्चिद्धनम् ॥१४१॥ निरीक्ष्य रावणस्याथ शशंस चकितस्तदा । भुक्तां मंदोदरीं ज्ञात्वा तां हन्तुं खङ्गमाददे ॥१४२॥ तदा निवारितः स्त्रीभिः स्त्रीहत्यां माकरोन्नृपनिः । यदा तृद्धो ददर्श वस्त्रमुक्त्वा गन्त्वा गयगृहम् । १४३॥ अथधौतिद्रितं वीरं खङ्गेन स्वगृहं ययौ । तदा विभीषणः प्रातश्चन्द्रहासमवेक्ष्य वै ॥१४४॥ दृष्ट्वा तां स गवां हन्तुं दुद्रुवे बर्जितामदा । मारिषैर्हन्त्वया भव्य स्त्रीहत्या गर्हिता त्विति ॥१४५॥ विभीषणस्तदारभ्य वधोऽसावममन्यत । एवमामोक्षलक्षणं कौतुकं कपिणा कृतम् ॥१४६॥ अथ वेगेन राक्षस्यः समागम्य दशाननम् । द्रुतं निवेदयामासुः स्वलङ्काया विनाशम् ॥१४७॥ तच्छ्रुत्वा रावणः क्रोधात्कपिनात्पाटितं वनम् । वनपालं समाहूय जम्बुपालिनमब्रवीत् ॥१४८॥ राक्षसैर्नियुतैर्गत्वा कीशं धृत्वा समानय । तथेति स ययौ वेगादशोकवनिकां प्रति ॥१४९॥ दृष्ट्वा सैन्यं दीर्घनादं चकार कपिकुञ्जरः । ततस्ते राक्षसाः सर्वेनिजैरायुधैरैनमभिदुद्रुवुः ॥१५०॥

मूलम् बाँध-बाँधकर गिरा दिया। उन्हें देखकर उस वृक्ष को कपि ने न १३५। उन्हें देखकर सीभार वृक्षके समस्त फल खा लिए। ऐसा करके उन्होंने उस उपवनके सब फलोंको खा डाला ॥ १३६ ॥ यह देखकर वनके रक्षकगण उन्हें पकडने दौडे। वृक्षानुकूल राक्षस का सा बानकर वे हिंसकसे ही दौडना प्रारम्भ कर दिया ॥ १३७ । इस प्रकार क्षणभरमात्र में अशोकवनको पूर्ण नष्ट कर दिया। केवल सीताके आश्रयभूत एक वृक्षको छोड और सब उपवनको उजाड़ डाला ॥ १३८ ... अथवा उड़ान क्योंकि बडे-बडे महलोंको गिरा दिया और उनके रक्षकोंको मार भगाया। राक्षसन जानकिका कपि जानकर सीतासे पूछने लगी कि यह कौन है, किसका दूत है और कहाँसे आया है ? सीता सुन कर कहा कि बहुतसे यथेच्छ रूप धारण करनेवाले राक्षस पृथ्वीपर आनन्दसे घूमा करते हैं। मुझे क्या पता। इस बातका पता मुझे सबसे लगा है, जब पञ्चवटीमें रावण हरण कर मुझे ले आया तब राक्षस ही मुँह छुपा ॥ १३७-१३९ ॥ सो तुम्हीं लोग इसका पता लगाओ कि यह कौन है, मुझसे क्या पूछती हो ? सीताके इस वचन को सुनकर राक्षसि भयसे विह्वल हो गयीं ॥ १४० ॥ यह हाल पूछनेके लिए वे लोग रावणके पास दौडे । इधर प्रातःकालके समय रावण अपनी प्रासाद-शय्यापर कमण्डलु देखकर चकित हो गया । रावणने सोचा कि गयन यहाँ आकर मन्दोदरीका काम है। यह शङ्का करके उसको मारनेके लिए हाथमें तलवार उठायी ॥ १४१॥ १४२॥ तब इसने स्त्रियोंने "स्त्रीको इस प्रकार नहीं मारनी चाहिए" ऐसा कहकर उसको रोका। तब क्रुद्ध रावणने शुद्धरस गयके घर जाकर देखा हाथमें तलवार सम्हारते काट दिया और अपने घर लौटा। उधर विभीषणने प्रातःकाल मदन अपने भाई रावणका महल जाकर तलवार देखा ॥१४४॥ १४५॥ तब वह अपनी स्त्री रम्भाको मारने दौड़ा। तब अनेक स्त्रियोंने उसका हाथ पकड़कर रोका कि तुम वीर होकर स्त्री- हत्या करना, सदा भारी निन्दित कर्म है ॥ १४५॥ तथापि विभीषणने उस दिनसे अपने घरमे इसका जाना छोड़ दिया। इस प्रकार लङ्कामें हनुमान्ने बड़े-बड़े कौतुक दिखाये ॥ १४६॥ उन राक्षसियोंने भी दौड़ते हुए जाकर व्याकुलचित्त रावणको घबराहटके कारण टूटे-फूटे शब्दोंमें अशोकवनके विनाशका सब वृत्तान्त सुनाया ॥ १४७॥ कपिके द्वारा वनभङ्गका समाचार सुनकर क्रुद्ध रावणने उस वनके रक्षक जम्बुमालीको बुलाकर कहा- ॥ १४८॥ तुम लाख हजार राक्षसोंको लेकर जाओ और उस बानरको पकड़ लाओ। 'तथास्तु' कह कर वह शीघ्र अशोकवनमें