भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ८९


तत उत्प्लुत्य हनुमान् तोरणेन समन्ततः । निष्पिपेप क्षणादेव मशकानिव यूथपः ॥ १५१॥
हत्वा तान् राक्षसान् सर्व्वास्ततो वेगेन मारुतिः । तालवृक्षं समुत्पाट्य जघान जम्बुमालिनम् ॥ १५२॥
तान् सर्व्वान्निहताञ्छ्रुत्वा पञ्चसेनापतीन्पुनः । रावणः प्रेषयामास हतास्ते तोरणेन च ॥ १५३॥
वायुपुत्रेण वेगेन लक्षराक्षससंयुताः । स तानापे मृताञ्छ्रुत्वाऽक्षं पुत्रं प्रेषयदत्तदा ॥ १५४॥
कपिना मारितः सोऽपि मर्सन्द्यो मुद्गरेण च । ततः स प्रेषयामास पुत्रमिन्द्रजितं पुनः ॥ १५५॥
ततः स रथमारूढः कोटिराक्षसवेष्टितः । युद्धं चकार कपिना शस्त्रैरस्त्रैः सुदुश्चरैः ॥ १५६॥
तदा पुच्छेन संवेष्ट्य कृत्वा प्राकारमुन्नतम् । निष्पिपेषाथ तोरणेन राक्षसान्मारुतिः क्षणात् १५७॥
ततो वृक्षं समुत्पाट्य मेघनादमताडयत् । वृक्षेण भिन्नसर्व्वाङ्गो मेघनादोऽविशद्गुहाम् ॥ १५८॥
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा प्रार्थयामास मारुतिम् । ब्रह्म त्वं मानयन्वेऽद्य त्वं लङ्कां याहि रावणम् । १५९॥
तथेत्यङ्गीचकारामौ मेघनादं ययौ विधिः विधिः प्राह मेघनादं क्व गतोऽद्य पराक्रमः । १६०॥
गच्छ मेऽस्त्रेण तं बद्ध्वा पितुरग्रे ममानय स ब्रह्मवचनं श्रुत्वा मेघनादः पुनर्ययौ । १६१॥
ब्रह्मास्त्रेणाथ बद्ध्वा समानयामास रावणम् । ततो रावणवाक्येन प्रहस्तः प्राह मारुतिम् १६२।
कस्त्वं कुतः समायातः प्रेषितः केन वा वद । ततः स रामवृत्तं हि कथयामास विस्तरात् ॥
ततस्तं बोधयामास रावणं वायुनन्दनः । १६३॥
विमुच्य मौर्थ्याद्धृदि शत्रुभावनां भजस्व रामं शरणागतप्रियम् ।
सीतां पुरस्कृत्य सपुत्रबान्धवो रामं नमस्कृत्य विमुच्यसे भयात् ॥ १६४॥
यादन्तगाभाः कपयो महाबला हरिंद्रतुल्या नखदंष्ट्रयोधिनः ।


गया । १४९ ॥ उसकी सेनाको देखकर कपिशिरोमणि कुञ्जर (हाथी) के समान वीर हनुमान् बहुत जोरसे गर्जन किया तब राक्षसोंने बाणोन्मत्त हनुमान्का अभ्यास मारना आरब्ध कर दिया ॥ १५० ॥ हनुमान् भी रणमें कूद पडे और समूहके समूह उन सेनापतियों तथा राक्षसोंको धारा राक्षस तारणके द्वारा क्षणभरमें पीस डाला । १५१ ॥ उन सबको मारनेके बाद मारुतिने वेगसे एक ताड़का वृक्ष उठा डकर उससे जम्बुमालीको समाप्त कर दिया ॥ १५२ ॥ उन सबको मार गये सुनकर रावणने पाँच और सेनापतियोंको भेजा हनुमान्ने तोरण मारकर से उन्हें भी मार डाला । १५३ । वायुपुत्र हनुमान्ने लाखा राक्षसके साथ उन पाँच सेनापतियोंको भी मार डाला, यह सुनकर रावणने अपने अक्षयनामक पुत्रको भेजा ॥ १५४ ॥ तब हनुमान्ने उसको भी मुद्गरसे मार डाला । अब रावणने अपने इन्द्रीजंत सुत मेघनादको भेजा । १५५ । वह एक करोड़ राक्षसस वेष्टित बनाया रथपर सवार होकर वहाँ आया। वह अपने दुर्धर्ष शस्त्रास्त्रोंसे हनुमान्के साथ युद्ध करने लगा ॥ १५६ ॥ हनुमान्ने उनको रोककर फिर अपनी पूंछका ही गढ़ बनाया और तोरणसे उन सबका क्षणभरमें पीस डाला ॥ १५७ ॥ बादमें एक वृक्ष उखाड़कर उससे मेघनादको मारा। जिससे घायल होकर वह एक गुफामें जा घुसा ॥ १५८ ॥ उस समय ब्रह्माने हनुमान्स प्रार्थना की कि तुम मेरे ब्रह्मास्त्र ब्रह्मपाश, का मान रक्खो और उसमं बंधकर लंकाम रावणके पास जाओ । १५९ ॥ उन्होने तथास्तु कहकर अङ्गीकार कर लिया । तब ब्रह्मा मेघनादके पास गये और कहा- हे मेघनाद ! तुम्हारा पराक्रम आज कहाँ चला गया ? ॥ १६० ॥ इस मेधास्त्रसे उन बानरको बाँधकर अपने पिताके पास ले जाओ ब्रह्माके बचनको सुनकर मेघनाद फिर वहाँ गया और हनुमान्को ब्रह्मास्त्रसे बाँधकर रावणके पास ले आया, तब रावणके कथनानुसार प्रहस्त उनसे पूछने लगा - । १६१ ।। १६२ .. बतला तू कौन है, कहाँसे आया है और तुझे किसने भेजा है ? तब विश्वास्स रामका वृत्तान्त सुनाकर हनुमान् रावणको समझाने लगे- । १६३ । आ रावण ! मूर्खतासे प्राप्त शत्रुभावको तू हृदयसे निकाल दे और शरणागतोंके प्रिय रामका भजन कर । यदि स ताको आगे करके पुत्र तथा बान्धवोंके साथ जाकर रामको नमस्कार करेगा तो तू निर्भय हो जायगा ॥ १६४ ॥ सिंहके समान महाबलवान्