श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ |
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लङ्कां समाक्रम्य विधास्यति ने तावद्द्रुतं देहि रघूत्तमाय ताम् ॥१६५॥ जीवन्न रामेण विमोक्ष्यसे त्वं सुरैर्हरैर्वापि शंकरेण । न देवराजांकगतो न मृत्योः पाताळलोकानपि संप्रविष्टः ॥१६६॥ शुभं हितं पवित्रं च वायुपुत्रवचः खलः। प्रतिजग्राह नैवादौ म्रियमाण इवौषधम् ॥१६७॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा मारुतं प्राह रावणः। विनिर्जिता येन देवास्तस्य मे पौरुषं त्वया ॥१६८॥ न दृष्टं ह्यतस्ते व्यर्थं शृणु किंचिद्वदामि ते। पञ्चाङ्गपाठकश्चायं पश्य ब्रह्मा कृतो मया ॥१६९॥ प्रतीहारस्त्वयं सूर्यः शशी छत्रधरः कृतः। वरुणोऽयं जलप्रदो मार्जकः पवनस्त्विह ॥१७०॥ अग्निः कृतोऽयं रजको मालाकारः शचीपतिः। दण्डपाणिर्विधात्र दास्यश्चात्र सुरस्त्रियः ॥१७१॥ मार्तण्डो नापितश्चायं गणपः सूपनायकः। मङ्गलाद्या ग्रहाः सन् मे सोपानायतनामने ॥१७२॥ शिशुमेवान्तरेण षष्ठी देवी मया कृता आन्दोलितश्च कैलासः कुबेरोऽपि विनिर्जितः ॥१७३॥ कथं ममाग्रे विलपस्यभीतवत्स गतासामवमानि दूषको । क एष रामः कतमो वनेचरो निहन्मि मूत्रांश्चत नगरम् ॥१७४॥ इत्युक्त्वा ह्यसमुत्तस्थौ दशान्यः सभास्थितः। तदा निवारयामास रावणं च विभीषणः ॥१७५॥ परदूतो न हन्तव्य इत्यादिरचनैर्मन्दी। ततः क्रोधसमाविष्टो रावणो लोकरावणः ॥१७६॥ दूतानाज्ञापयामास छेदनीयं तु लांगूलम्। तद्रावणवचः श्रुत्वा राक्षसास्ते सहस्रशः ॥१७७॥ स्वायुधैश्छेदयामासुः कुठारक्रकचादिभिः। आयुधान्येव खण्डाःपुच्छचालनमात्रतः। ॥१७८॥ बभूवुः सुप्रचूर्णानि तस्य रोम्णोऽपि न व्यथा। तन्निस्वा दशान्यः सन्म,रुतिं वाक्यमव्रवीत् ॥१७९॥ न धीरा गोपयन्त्यत्र स्वांय मृत्युमपि क्वचित्। अतस्त्वं वद पुच्छस्य येन वानोड्य ते भवेत् ॥१८०॥
और तबके तथा होतेको लक्ष्मणवान् वानर आकर लंकाको दग्ध न करदे, तबतक उस सीताको ले जाकर रामको दे दे ॥ १६५ ॥ अब तुम राम जीवित नहीं छूटेगा। चाहे हरि रक्षा करेंगे, चाहे शंकर करें, चाहे तू अपना प्राण बचानेके लिये देवराजकी शरणमें जा, चाहे यमराज या पाताललोकमें जाकर छिप, चाहे कुछ कर ले ॥ १६६ ॥ किन्तु उस दुष्ट रावणने हनुमान्की शुभ हितकारिणी बात उस प्रकार नहीं मानी । जैसे मुमूर्षु पुरुष औषधि नहीं खाता । १६७ ॥ रावणने हनुमान्को बात सुनकर कहा कि मैने सब देवताओंको जीत लिया है । मेरे पुरुषार्थको तू नहीं जानता । इसलिये व्यर्थ बकवास कर रहा है, सुन मैं तुझ कुछ सुनाता हूँ । देख, ब्रह्माको मैंने पञ्चाङ्गपाठक बना दिया है ॥ १६८ ॥ १६९ । सूर्यको द्वारपाल, चन्द्रमाको छत्रधारी, वरुण को जल भरनेवाला, पवनको झाडू लगानेवाला, अग्निको धोबी, शचीपति इंद्रको माली, दण्डपाणि यमराजको द्वारपाल देवताओंकी स्त्रियोंको दासियां, मार्तण्डको नाई, गणपतिजीको पाकशालाध्यक्ष और मंगल-बुध आदि सातों ग्रहोंको मैंने अपने आसनकी सीढियां बना लिया है षष्ठी देवी सन्तानको मैंने बच्चोंकी मुख्यमेवाली धाई बनाया है। कैलासको मैंने ही हिलाया था। कुबेरको भी जीत लिया है । १७०-१७३॥ हे प्लवङ्गाधमे अधम वानर ! तू मेरे आगे क्यों वृथा प्रलाप करता है ? तू बड़ा ही गर्व दिखाता है। अरे ! वनवासी राम मेरे सामने क्या चीज है । मनुष्यमें नाम मात्रका भी मूत्रांश नगरके में मार डालूँगा ॥ १७४ ॥ इतना कहकर दशानन रावण बाज समान उनको मारने दौड़ा । तब विभीषणने समझा बुझाकर कहा कि विचारके दूतको मारना अन्याय है । पश्चात् क्रोधके वशमें आकर रावणने लोक रावण विभीषणको आज्ञा दी कि इस वानरकी पूंछ काट डालो । रावणकी आज्ञा पाकर हजारों राक्षस अस्त्र-शस्त्र युक्तहो और क्रकच ( आरा ) आदि हथियारोंसे उनका पूंछ काटने लगे । इसी समय हनुमान्जीने अंदर अपनी पूंछ हिला दी। उनके हिलनमात्रस उन हथियारोंके सैंकड़ों टुकड़े होकर गिर पड़े। १८० तक चूर्ण-चूर हो गये परन्तु हनुमानजीका बाल भी बाँका नहीं हुआ। यह देखकर दशानन मारुतिस कहने लगा- ॥ १७९ ॥ धीर पुरुष अपनी मृत्युके उपायको भी छिपाकर नहीं रखते। इसलिये साफ-साफ बता दे कि तेरी पूँछ किस उपायस नष्ट होगा ॥१८०॥