भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः १०] बालकाण्डम् १०५

परे श्रुते न किं शैला इत्युक्तोऽनर्हकृत्यः । इह संति सतो मान्या मान्यास्ते तु स्वभूमिषु ॥९१॥ सवैश्वेदेहसंदेहा वदरैकपाश्रिताः विषवृक्षीषधिव्योऽप्यन्तोऽप्यन्तर्मित्रगभः ॥९२॥ नीलश्च नीलनिलयो मंदरो मंदलोचनः । मलयः स मलयो गंधं नद्याप रैवतः ॥९३॥ हेमकूटत्रिकूटाद्याः कूटाङ्गपदभाग् तु ते । किष्किन्धक्रोञ्चमख्याद्या मागस्त्या न ते भुवः ॥९४॥ इति विंध्यवचः श्रुत्वा नारदो हृद्यचिन्तयत् अहंवंशवेशभंगो न महद्भाव कल्पते ॥९५॥ श्रीशैलमुख्याः किं शैला नेह सन्त्यपलश्रियः येषां शिखरमात्रादिर्शनेन मुक्तये मताम् ॥९६॥ अथास्य बलमालोच्यमिति ज्ञात्वाऽब्रवीन्मुनिः गन्ययुक्तं कि भवता गिरिराजं विमुञ्चता ॥९७॥ परः शैलेषु शैलेन्द्रो मेरुस्त्वामवमन्यते । मया निश्शायित चेन्नत्यद्यापि निवेदितम् ॥९८॥ अथवा मद्विधानां हि केय चिंता महन्मनाम् । पश्यत्यस्तु तुभ्यमित्युक्त्वा ययौस व्योमवर्त्मना ९९॥ गत मुनौ निंदिंद स्वमनायोद्विग्नमानसः । चिंते विचारयामास मेरोः श्रेष्ठ्य कथं विति ॥१००॥ देवं प्रदक्षिणं कुर्यान्नित्यमेव दिवाकरः । सग्रहमंडलो नूनं मन्यमानो बलाधिकम् ॥१०१॥ इति निश्चित्य विंध्याद्रिर्ववृधे स मुधैषणः । निरुध्य त्राध्यमध्वान स्वम्भोऽभूद्गगनांगणे ॥१०२॥ ततः प्रभाते सूर्योऽसौ दिशि याम्यां समुद्यतः । गंतुं रुद्धं स्वपंथानं दृष्ट्वाऽभ्यस्थोऽभवद्गिरौ ॥१०३॥ योजनानां सहस्रे द्वे द्वे शते द्वे च योजने । पः स्वमध्यनिमेपार्द्धाद्याति नापिरिर स्थितः ॥१०४॥ गते बहुतिथे काले प्राच्योदीच्या भृशार्दिताः । चण्डरश्मेः करत्रातशनमतापनाशिताः ॥१०५॥ पाश्चात्या दाक्षिणात्याश्च निद्रापुद्रितलोचनाः । भ्रमिता एव दृश्यंते मतःप्रहमवश्यम् ॥१०६॥ स्वाहास्वधावषट् स्वाहार्जने जपनीताने । पंचयज्ञक्रियालोगात्तच्चक्रम् भुवनत्रयम् ॥१०७॥

क्या दण्डक०का निवासस्थान सुन्दर भी वह विन्ध्य माननीय नहीं है ॥१०॥ क्या पृथिवीका धारण करने- अन्य सैकड़ों पर्वत इस संसारमें नहीं हैं? क्या वे सभी पर्वत सज्जनोंके मान्य हैं? नहीं, यदि हैं भी तो केवल अपने-अपने स्थानपर ॥९१॥ उदयाचल मन्द है। वह राक्षस का आश्रय देनका कृपा कल्पस ही सम्भव है। त्रिगर्तारि ओषधिमात्र धारण करते हैं, अन्तानल निस्तेज हो गया है ॥९२॥ नीलाञ्जनके नाम सम्द्रुमात्र है। मन्दराचल मन्ददृष्टि है। मलय पर्वत सर्पोंका घर है। रैवत निर्धन है ॥९३॥ हेमकूट तथा त्रिकूट आदि केवल कूट दगापदवाले ही हैं। किष्किन्धा, कौञ्च और सह्य पर्वत भी सृष्टिके बाझको हरण करनेमें समर्थ नहीं है ॥९४॥ विन्ध्याचलकी इस बातको सुनकर नारदन मनमें विचार किया कि प्राणी महत्त्वके योग्य नहीं होता ॥९५॥ क्या इस श्रीशैल आदि पर्वत निर्मल कान्ति- सम्पन्न तथा यशस्वी नहीं है ? जिसके शिखरके दर्शनमात्रसे शुद्ध अन्तःकरणवाले महान् पुरुषोंको मुक्ति मिल जाती है ॥९६॥ अतएव आज इसके बलकी परीक्षा करनी चाहिए। ऐसा विचार करके नारद मुनिने कहा - दूसर पर्वतोंका बल कुछ वर्णन किया है ॥९७॥ पर पर्वतोंमें श्रेष्ठ मेरुपर्वत तुम्हारा अपमान करता है। वह तुमसे भी अपनेको बढ़कर मानता है। बस, यही कारण है कि मैंने सम्भाषणत किया था और यह बात तुमसे भी कह दी ॥९८॥ अथवा हम जैसे महात्माओंको इस बातकी क्या चिंता है। तुम्हारा कल्याण हो ? इतना कहकर वे व्योममार्गसे चले गये ॥९९॥ नारद मुनिके चले जानेपर अतिशय चिन्ताकुल होकर विन्ध्याचलने अपने आपको बड़ी निन्दा की और सोचने लगा कि मेरुकी इतनी बड़ी महिमा क्यों है ? ॥१००॥ उस मेरुकी नक्षत्रों सहित सूर्यनारायण प्रतिदिन उसकी परिक्रमा करते हैं। सम्भवतः इसीसे उसको अपने बल-पौरुष तथा महत्त्वका अभिमान है ॥१०१॥ ऐसा निश्चय करके विन्ध्याचलने उसकी समृद्धि देखने- की उत्सुकता अपना शरीर बहुत ऊपरको बढ़ाया और मूर्द्धके समान [खम्भा] बनकर आकाशाप्यो बीचमें खड़ा हो गया ॥१०२॥ प्रातःकाल सूर्यने दक्षिण दिशाकी ओर जानेको प्रस्थान किया। तब रास्ता रुका देखकर वे वहीं रुक गए। जब बहुत दिन बीत गये, तब सूर्यके प्रचण्ड किरणसमूहके हाथसे पूर्व तथा उत्तर दिशाके लोग जलने लगे ॥१०३-१०५॥ पश्चिम तथा दक्षिण दिशाके लोगोंकी आँखें निद्रासे मुंदी रहीं। ये सब ॥१०६-१०७॥