भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः १०] सारकाण्डम् १९३

एवं नानाविधैर्वाक्यैरंगदेनातिबोधितः सोऽथ नीतिपुनर्वाक्यमप्यशृणोद्रानवस्य च ॥२२५॥
उवाच क्रोधसंयुक्तो वानरं स दशाननः । भीषयसेऽद्य किं मां त्वं रावणं लोकरावणम् ॥२२६॥
येन सर्वे जिता देवाः कैलासः कम्पितो मया । तस्य मेऽग्रे मर्कट त्वं कत्थसे किं मुधाऽद्य हि ॥२२७॥
क्षणेन राघवौ हन्त्वा हन्त्वा सुग्रीवमारुती । हन्त्वा विभीषणं त्वां च वानरान् भक्षयाम्यहम् ॥२२८॥
रावणस्य वचश्चैवं श्रुत्वा प्राहांगदस्त्वहम् । जानाम्यहं पौरुषं ते बलिपातालनिर्गत ॥२२९॥
शिवपादांगुष्ठ भारनम्रकैलासपीडित । सहस्रार्जुनदीर्घत्तमभवत्क्रीडनमृग ॥२३०॥
श्वेतद्वीपस्थप्रमदाकराताडितमन्मथ । विष्णोःपुत्रोऽभवद् ब्रह्मा मरीचिस्तत्सुतः स्मृतः ॥२३१॥
तत्सुतः कश्यपस्तस्य पुत्रोऽभूदिन्द्रनामकः । तेनैवं वृद्धकाले तु बद्ध्वा कारागृहेस्थित ॥२३२॥
पर्यंङ्कोपरि सबद्धन्मूत्रक्षालितानन । इति तद्वाक्यशराघातानर्जितः स दशाननः ॥२३३॥
दशानाज्ञापयामास ताडनी यो मुखे त्वरम् । तथेत्युक्त्वा राक्षसास्ते शस्त्रहस्ताः सहस्रशः ॥२३४॥
अंगदं दुद्रुवुः शीघ्रं तान् दृष्ट्वा वानरोत्तमः । मर्दयामास पुच्छेन तान्सर्वान् क्षणमात्रतः ॥२३५॥
रावणस्येषु समासाद्य स्वकराभ्यां मुहुर्मुहुः । तद्धस्तपादौ पुच्छेन पूर्वं बद्ध्वा सविस्तरम् ॥२३६॥
ततश्चोत्प्लुत्य वेगेन ययौ प्रासादमस्तकः । सुवेलाद्रौ राघवेंद्रं तारेयः स विहायसा ॥२३७॥
अंगदं राघवो दृष्ट्वा प्रासादान्वितमस्तकम् । उवाच किं कृतं वत्स प्रासादोऽयं त्वया कथम् ॥२३८॥
मयानीतोऽत्र लंकायां मित्रायैषा पुरी मया । अर्पिताऽस्ति ततो मित्रद्रविम्वेदं न स्पृशाम्यहम् ॥२३९॥
तद्राघववचः श्रुत्वा चकितः स तदांगदः । प्रासादं मस्तके दृष्ट्वाऽऽक्षिप्यागाड राघवम् । २४०॥


और उनसे द्वेष करना छोड़ दो। जिनके चरणकमलरूपी जहाजका आश्रय लेकर ज्ञानी लोग गतिसे पवित्र मन होकर इस संसाररूपी समुद्रको अनायास पार कर जाते हैं, वे राम मनुष्यमात्र नहीं हैं। हे राजन् ! यदि अपने कुलकी कुशलता चाहते होओ तो यह कहा करो ॥ २२३, २२४ ॥ इस प्रकार विविध वाक्योंसे अंगदने उसे बहुत समझाया, परन्तु उसने अङ्गदका एक भी नीतिपूर्ण वाक्य नहीं सुना ॥ २२५ ॥ प्रत्युत क्रुद्ध होकर रावण अङ्गदसे कहा—'अरे नीच ! तू आज सब लोकोंको रुलानेवाले मुझ रावणको डराने आया है ? ॥ २२६ ॥ अरे ! मैंने सम्पूर्ण देवताओंको जीतकर कैलास तकको कंपा दिया है। ऐसे मुझ वीरके सामने अरे मर्कट ! तू क्यों व्यर्थ बकवाद कर रहा है ॥ २२७ ॥ मैं क्षणभरमें राम, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनूमान्, विभीषण तुझे और सब वानरोंको मारकर खा सकता हूँ ॥ २२८ ॥ इस प्रकार रावणका गर्वरूपी वाक्य सुनकर अङ्गदने कहा हे बलिपातालसे विनिर्गत ! हे शिवपादांगुष्ठसे मानम्र कैलाससे पीड़ित ! हे सहस्रार्जुनके क्रीड़ामृग ! हे श्वेतद्वीपके स्त्रियोंके हाथसे ताड़ित मुखवाले रावण ! मैं तेरे बलको जानता हूँ। यह मुझे मालूम है कि विष्णुके पुत्र ब्रह्मा, ब्रह्माके पुत्र मरीचि, मरीचिके पुत्र कश्यप, कश्यपके पुत्र इन्द्र और इन्द्रके पुत्र बालिने तुझको वृद्धके समय बाँधकर कारागारमें डाल रक्खा था। वहाँ तुम्हारा मुख चारपाईमें बँधनेके कारण भरे मूत्रसे भर जाता था। अङ्गदके इस वाक्यरूपी बाणोंसे विद्ध होकर रावण लज्जित हो उठा ॥ २२९-२३३ ॥ उसने दूतोंको आज्ञा दी कि मार मारकर इसका मुंह लाल कर दो। तब 'तथास्तु' कहकर हजारो राक्षस हाथमे शस्त्र लेकर अङ्गदकी ओर झपटे। उन्हें देखकर वानरोत्तम अङ्गदने अपनी पूँछकी मारसे उन सबको क्षणभरमें धराशायी कर दिया ॥ २३४ ॥ २३५ ॥ तदनन्तर पूँछसे रावणके हाथ पाँव अच्छी भाँति बाँधकर अंगदने उसके मुखपर खूब तमाचे लगाये ॥ २३६ ॥ तत्पश्चात् वहाँसे उड़कर अङ्गद आकाशमार्गसे सुवेल पर्वतपर रामके पास लौट गया। उड़ते समय रावणका मुकुट भी उनके सिरपर बैठकर चला आया ॥ २३७ ॥ रामने अंगदको मस्तकपर महल लिये आते देखकर कहा- हे बलिपुत्र ! तुम इस महलको क्यों उठा लाये ? । २३८ ॥ मैने लंकापुरी मित्र विभीषणको अर्पण कर दी है। इसलिए मै तो मित्रकी इस वस्तुको छू भी नहीं सकता ॥ २३९ ॥ रामकी यह बात सुनकर अंगद चकित हो गये जब अङ्गदने ऊपरकी ओर आंखें की तो अपने सिरपर मकान देखकर रामके