भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ११ ] सारकाण्डम् ११७

भस्मीकरोमि तत्सून्या लङ्कामिन्द्रजितो ययौ । विलपन्तौ स्वपार्श्वस्थौ तदा वायूतगङ्गजौ ।।१३।।
वरदानादहन्पन्नौ दृष्ट्वा रामः स जीविनौ । तावुवाच रघुश्रेष्ठो युवाभ्यां यांतवान् रणे ।।१४।।
गत्वाऽस्ति जीवितश्चेद्धि वाच्यस्तर्हि गिरो मम। उपायं चिंतयस्वाशु वानराणां सुजीवने ।।१५।।
तद्रामवचनं श्रुत्वा तौ विभीषणमारुतौ । निशाय तौ विचिन्वन्तौ जांबवंतं प्रजग्मतुः ।।१६।।
उल्मुकहस्तौ तं दृष्ट्वा प्रोचतु राघवेरितम् । जांबवानपि तौ रामगिर श्रुत्वाऽतिहर्षितः ।।१७।।
निमीलिताक्षः प्रोवाच कौ युवां वायुजो रणे । चेदस्ति जीवितस्तर्हि जीवयिष्यति वानरान् ।।१८।।
तदा विभीषणः प्राह त्यक्त्वाऽन्यांगदादिकान् । पृच्छत्यनेऽद्य कथं वायुपुत्रस्य परमादरात् ।।१९।।
तदा विभीषणं प्राह जांबवान्मुख्यमत्रतः, रुद्रावतारः सज्ञेयो वायुपुत्रः प्रतापवान् ।।२०।।
न ज्ञेयः कपिरेवात्र तस्माच्च विलोचय तदाऽब्रवीज्जांबवंतं नन्वा स वायुनन्दनः ।।२१।।
यं त्वं पृच्छसि सोऽयाह जीवितोऽस्त्यद्य मारुतिः । विभीषणो द्वितीयोऽयं यस्त्वया परिभाषते ।।२२।।
तदा स जांबवास्तुष्टो मारुति वाक्यमब्रवीत् । गत्वा क्षीरनिधि वेगाद्रोणाद्रिं त्वं समानय ।।२३।।
तथेत्युक्त्वा स्वरन् गत्वा गंधर्वगोपितं नगम् कामधेन्वा स्वौषधंमनेत्रलेपान्प्रदर्शनम् ।।२४।।
उत्पाट्य पुष्पवद्धृत्वाऽऽनयामास कपिजंवात् पर्वतोद्भववल्लीनामवघ्राणात्सुनोपमम् ।।२५।।
सुगंधं जीवयिष्यति राक्षसानेति शुक्या । निहतान् राक्षसान्सर्वास्तदा वाक्यविभीषणौ ।।२६।।
निक्षिपतुः सागरे तान् गंधवस्याहया क्षणात् तदानीं तं गिरि दृष्ट्वा सुषेणः स भिषावरः ।।२७।।
पर्वतोद्भववल्लीभिर्जीवयामास तान् कपीन् । ततः प्राप्तायुगाः सर्वे समुत्तस्थुर्विजृम्भिताः । २८।।
द्रोणाचलं यथास्थाने स्थापयामास मारुतिः । कुबेरनेत्रदिव्यांभः प्रमृज्य नयनपु च ।।२९।।

ब्रह्मास्त्रसे मूर्छित होकर जमानपर पड़ा देखा । सो देखकर उन्होंने लक्ष्मणसे कहा- हे सौमित्रे ! धनुष साधो, मैं इन सब वानरोंका भस्म कर दूंगा । यह कहकर मेघनाद लङ्काको भाग गया । उस समय रामने अपने पास ही विलाप करते हुए तथा ब्रह्माके वरदानसे जीवित वायुपुत्र और विभीषणको देखकर उन दोनोंसे कहा-तुम लोग रणांगणमें जाम्बवान्‌के पास जाओ और यदि वे जीवित हों तो उन्हें मेरा सन्देश सुनाते हुए कहो कि वानरोंके जीवित होनेका कोई उपाय हो सकता है वा ? ॥ १५ ॥ रामकी आज्ञा सुनकर मारुति तथा विभीषण अर्धरात्रिके समय जाम्बवान्‌को खोजने निकले । १६ । दोनोंके हाथमें मशाल ले थी । खोजते-खोजते जब जाम्बवान् मिले तो उन्हें रामका संदेश सुना दिया । जाम्बवन् यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ १७ । आँखोंको निमीलित किये हुए ही वे बोले कि तुम दोनों कौन हो ? यदि वायुपुत्र हनुमान् इस रणक्षेत्रमें जीवित हैं तो वे सब वानरोंको जिला देंगे ॥ १८ । तब विभीषणने कहा-हे जाम्बवान् ! तुमने अंगद आदि वीरोंको छोड़कर बड़े आदरके साथ वायुपुत्रको ही क्यों पूछा ? ॥ १९ । इसके उत्तरमें श्रेष्ठ जाम्बवान्ने विभीषणको उत्तर दिया कि प्रतापी वायुपुत्र हनुमान् साक्षात् रुद्रके अवतार उत्पन्न हुए हैं । २० । उनको केवल कपि ही न समझो । अब तुम उनको पहिचानो। तब हनुमान्ने नमस्कार करके जाम्बवान्‌से कहा-॥ २१ । जिसको आप पूछ रहे हैं, वह मारुति जीवित खड़ा है । दूसरा जो आपसे बात कर रहा है, वह विभीषण है । २२ ।। तदनन्तर प्रसन्न होकर जाम्बवान्ने मारुतिसे कहा-तुम क्षीरसागर जाकर शीघ्र द्रोणाचलको ले आओ ॥ २३ ॥ 'तथास्तु' कहकर हनुमान् शीघ्र चल दिये और गन्धर्वों द्वारा सुरक्षित तथा कामधेनुका दूध या लगे नेत्रोंसे दिखाई देते हुए उस पर्वतको उखाड़कर फूलकी तरह शीघ्र उठा ले आये । इधर इस शङ्कासे कि पर्वतोत्पन्न औषधोंकी सुगन्धित वायुसे इन राक्षस भी जी जायेंगे, गरुड़ तथा विभीषणने उन्हें रामकी आज्ञासे उठा उठाकर समुद्रमें फेंक दिया अब वैद्यवर सुषेणने द्रोणागिरिको देखकर पर्वतोत्पन्न औषधियोंसे उन मरे हुए वानरोंको जिलाना आरम्भ किया। सहसा वे सब वानर जंभाई न लेकर खड़े होने लगे ।। २४-२८।। तदनन्तर मारुति पुनः द्रोणाचलको यथास्थान रख आये और कुबेरके दिये हुए दिव्य जलको आँखोंमें लगाकर वे रणमें राम आदि अन्तर्हिताओंको देखने लगे । उसी समय रावणने भी अतिकाय, प्रहस्त,

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