भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ११ ] सारकाण्डम् २१९


मुनिना मानितश्चापि जलकुम्भः प्रदर्शितः । शशांसः प्राह ह्यसितेनैतेन भविष्यति ॥४९॥
तं पुनः प्राह स मुनिस्तटाकं निकटस्थितम् । गच्छाक्षिणी विधाय त्वं जलं पिव यथासुखम् ॥५०॥
आगच्छाशु पुनश्चात्र सुखं निष्टु क्षणंस्वसु । जानामि ज्ञानदृष्ट्याऽहं लक्ष्मणश्चोत्थितस्त्वयि ॥५१॥
गृहाण मन्त्रान् मत्सम्वं येन पश्यसि तं गिरिम् । योषिनं गच्छ गन्धर्व्वपं त्वं नेतुमिच्छसि ॥५२॥
प्लवगानां जीवनार्थं लङ्कायां वेगतः कपे । मन्त्रञ्च लब्धविप्र मन् दत्तञ्च गुरुदक्षिणाम् ॥५३॥
तथेति मारुतिर्गत्वा कासारमपिबज्जलम् । विधाय नेत्रे तावद्वयाघ्रवन्मकरी तदा ॥५४॥
सोऽपि तां दारयामास धृत्वाऽस्ये सा ममार ह । ततोऽन्तरिक्षे सा प्राह दिव्यरूपान्तु मारुतम् ॥५५॥
पुगऽहं मुनिना स्पृष्ट्या प्रार्थिता न रतिर्मया । दत्ता समाऽस्त्वि त्वन्तो मे निष्कृतिस्तेनकीर्तिता ॥५६॥
धान्यमालीति विख्याताऽप्सराः पूर्वं भवांतरे । आश्रमे यस्त्वया दृष्टः कालने मिर्महामुरः ॥५७॥
रावणप्रेषितो मार्ग्य स्थितस्तं जहि वेगतः । तथेति मारुतिर्गत्वा मुनिं प्राह त्वरान्वितः ॥५८॥
मुष्टिं बद्ध्वा दृढां घोरां गृहाण गुरुदक्षिणाम् । इत्युक्त्वा ताडयामास हृदि तं मूर्ध्निना तदा ॥५९॥
पपात भुवि रक्तं स वमन् प्राणान् जहौ क्षणात् । ततः क्षीरांनिधिं गत्वा जित्वा गन्धर्वसञ्चयान् ॥६०॥
द्रोणाचलं गृहीत्वा स यावद्गच्छति मारुतिः । विहायसाऽतिवेगेन लङ्कां तावच्च तं पथि ॥६१॥
भरतेन शरं मुक्त्वा पर्वतो भुवि पातितः । भग्नं मारुतिर्दृष्ट्वा रामोऽयमिति विह्वलः ॥६२॥
उवाच मधुरं वाक्यं कथमत्र मयागतः । जितं किं रावणेनेन्द्र रणं त्यक्त्वा पलायितः ॥६३॥
एवमुक्तोऽपि भरतः पुनस्तं मरुतिं वचन् । मत्वाऽथ राक्षसोऽयंति सद्दधे निशितं शरम् ॥६४॥


मारुति रस्तेमें मुनिका आश्रम देखकर उत्तम जल पीनेके लिए गये ॥ ४८ ॥ मुनिने मारुतिको सम्मान किया और जल पीनेके लिये उनको एक भरा घड़ा दिखाया। तब हनुमान्ने कहा कि इतनेसे मेरी तृप्ति नहीं होगी ॥ ४९ ॥ तब मुनिने उन्हें एक तालाब दिखाया और कहा कि वहाँ जाकर तुम आँखोंको बन्द करके आनन्दपूर्वक जल पी लो ॥ ५० ॥ बादमें आकर यहीं पर विश्राम लेना। मुझे ज्ञानदृष्टसे पता लग गया है कि लक्ष्मण उठ खड़ा हुआ है। इसलिए अब चिन्ताका कोई बात नहीं है ॥ ५१ ॥ दूसरी बात यह है कि मैं तुम्हें कुछ ऐसे मन्त्र बताऊंगा कि जिनसे तुम्हें मन्त्रों द्वारा रचित वह पर्वत दिखलाई दे जायगा, जिसको कि तुम ले जाना चाहते हो ॥ ५२ ॥ उसकी कृपा से जाकर तुम वानरोंको शीघ्र जिला सकते हो। इस प्रकारकी विद्या मुझसे ग्रहण करके बाद मुझ गुरुको गुरुदक्षिणा भी देनी होगी ॥ ५३ ॥ 'बहुत अच्छा' कहकर मारुतिने तालाबपर जाकर जल पिया परन्तु नेत्र बन्द होनेके कारण उस समय एक मकरीने आकर उन्हें पकड़ लिया ॥ ५४ ॥ तब मारुतिने उसका मुंह पकड़कर चीर डाला। जिससे वह मकरी मर गयी। पश्चात् वह दिव्य रूप धारण करके आकाशमें जाकर मारुतिसे बोली ॥ ५५ ॥ पूर्वकालमें एक मुनिने मुझको दुराचार करनेके लिए कहा परन्तु जब मैने उन्हें रति नहीं दी। तब उन्होंने मुझ मकरी होनेका शाप देकर कहा कि तेरा निस्तार मारुतिसे होगा ॥ ५६ ॥ पूर्वजन्मम में धान्यमाली नामकी विख्यात अप्सरा थी। इसी आश्रममें जो एक मुनि बैठा हुआ अपने देखा है, वह कालनेमि नामका महान् राक्षस है। ५७॥ रावणने उसको आपके मार्गमें विघ्न डालनेके लिए भेजा है। आप शीघ्र जाकर उसको मार डालें। 'अच्छी बात है' कहकर मारुति तुरन्त वहाँ पहुँचे ॥ ५८ ॥ उन्होंने दृढ़ मुक्का बाँधकर 'यह लो अपनी गुरुदक्षिणा' ऐसा कहते हुए उसकी छातीमें जोरसे मुक्का मारा ॥ ५९ ॥ उस प्रहारसे वह जमीनपर लुढ़क पड़ा। उसके मुँहसे रक्त बहने लगा और क्षणभरमें वह मर गया। तदनन्तर क्षीरसागर जा तथा गन्धर्वोंको जीतकर द्रोणाचलको लिये हनुमान् आकाशमार्गसे जा रहे थे कि रास्तेमें भरतने बाण मारकर उनके हाथसे वह पर्वत गिरा दिया। हनुमान् भरतको देख उन्हें प्रत्यक्ष राम समझकर घबड़ा गये ॥ ६०–६२ ॥ उन्होंने मधुर वाणीमें कहा—हे राम ! आप यहाँ कहाँसे और क्यों आ गये ? क्या आपको रावणने जीत लिया ? अथवा रण छोड़कर आप यहाँ भाग आये हैं ॥ ६३ ॥ मारुतिके इतना कहनेपर भी भरतने उन्हें राक्षस समझकर मारनेके लिए एक