भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 811 में से

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पृष्ठ 286

२७० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४


तदूर्ध्वः कङ्कणानि हेमजानि घनानि च । रत्नमाणिक्यमुक्ताभिश्चित्रितान्युज्ज्वलानि च ॥ ६२॥
प्रवालमयी मुक्तानां कङ्कणानिर्विचित्रितान् । कर्णयोः सारिके दिव्ये शुशुभाथे रत्नमण्डिते ॥६३॥
तदूर्ध्वं कङ्कणान्येव पुष्पवल्ल्यङ्कितानि हि । दंतराड्युपमार्थानि रत्नहेमोज्ज्वलानि च ॥६४॥
अंगुलीषु ददृशुस्ते मुद्रिका रुक्मनिर्मिताः । रत्नमाणिक्यमुक्ताभिर्नीलपार्वतसंज्ञिषु ॥६५॥
प्रवालचन्द्रकांतैश्च सूर्य्यकांतैर्विचित्रिताः । नानापुष्पोपमा दिव्याः प्रतिपर्वमथाश्रिताः ॥६६॥
ततो ददृशुः सीताया रम्यं गण्डेऽतिमोऽज्ज्वलम् । दिव्यं मयूरं चित्रं च वररुक्मविनिर्मितम् । ६७ ।
मणिमाणिक्यमुक्ताभिर्नानारत्नैः सुमण्डितम् । लंबिनं मौक्तिकादीनां वरगुच्छैः सुवेष्टितम् । ६८।
ततो ददृशुः सीतायाः कर्णयोर्भूषणानि ते । मकरध्वजसादृश्ये ताटंके रत्नचित्रिते ॥६९॥
मणिमाणिक्यमुक्ताभिर्गुम्फिते सोऽज्ज्वले वरे । रत्नपुष्पादिभिश्चित्रैर्विचित्रिते रविभास्वरे । ७०॥
ततो भ्रमरिके दिव्ये रुक्मरत्नविचित्रिते । मुक्ताभिर्गुम्फिते रम्ये हेमपुष्पाणि वै तथा ।७१॥
कर्णयोः शृङ्खलाश्चित्रा ददृशू रुक्मनिर्मिताः । मुक्तागुच्छैर्गुम्फिताश्चरत्नमाणिक्यमण्डिताः ॥७२॥
आकर्णाभ्यां च सीमन्तपर्यन्तं मालपासयोः । हार्यद्रुक्मवालानि माणिक्यरमहितानि हि ॥७३॥
मुक्तागुच्छैर्गुम्फितानि वैदूर्य्यविचित्रितान्यपि । ततस्तदूर्ध्वं सभाया ददृशुः शिरसि द्विजाः ॥७४॥
सीमन्तयोरुत्तरे याम्ये केशेषु सूर्य्यभास्करौ । रुक्मजौ रत्नवैदूर्यमणिमुक्ताविचित्रितौ ॥७५॥
नीलकान्तींग्रकांतैश्च विद्रुमैर्विद्योतिनौ । चन्द्रसूर्य्याविव स्वायभासा दारयन्तौ दिशः । ७६॥
निटिले तिलकं रत्नमणिमुक्ताविराजितम् । दैवं दिव्यमुज्ज्वलं च कोटिसूर्य्यसमप्रभम् ॥७७॥
ततो ददृशुः सीमन्तं मुक्ताहारं महोज्ज्वलम् । नानारत्नविचित्रं च सर्वांगतिलकावधि । ७८।
चूडामणिं च ददृशुस्ते जनकेन समर्पितम् । नानारत्नविचित्रं च मुक्तागुच्छविराजितम् ॥७९॥


थे। काँचकी बनी हुई चूड़ियोंके मध्यम में सूर्य और चन्द्रमाकी नाईं मालूम पड़ते थे ॥ ६१॥ उनके ऊपर- पाँच सुवर्णके गाढ़े मटकड़े पड़े थे, वे भी नाना प्रकारके रत्न'स विचित्र दाप्ति धारण कर रहे थे ॥ ६२॥ उन्हींके ऊपर प्रवालमणि मुक्ता आदि मण्डीत एक-एक दिव्य सारिकाएं बनी थीं ॥ ६३॥ उनके भी ऊपर रत्ननिर्मित फूलों और लताओंसे जटित कंकण पड़े थे ॥ ६४॥ उँगलियोंम सुवर्णकी बनी रत्न, माणिक्य, नीलम, मरकत मणि आदिसे जटित अनेक अंगूठियां थीं। वे भी प्रवाल, चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त आदि मणियांस विचित्र मालूम होती थीं । ६५ ॥ ६६ ,, इसके अनन्तर सब लोगोन सीताकी नासाग्रणिको देखा, जिसमें एक दिव्य स्वर्णमयूर बना हुआ था। वह भी नाना प्रकारके मणियोंसे अलंकृत था ॥ ६७ ॥ उसमें भी मणि-माणिक और माणिक्य शुभ्र लटक रहे थे ॥६८॥ इसके बाद लोगोने सीताके कर्णभूषणोंको देखा। जिनमें मकरध्वजके सदृश विविध रत्नोंसे चित्रित झुमके थे। उनमें भी मणि-माणिक और मोतियोंके झुच्छे लटक रहे थे। रत्ननिर्मित पुष्पोंसे वे सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहे थे। ६९ ॥ ७० ॥ फिर लोगोंने सीताके कानोंमें पड़ी हो भ्रमरिकाओंको देखा। वे भी सुवर्णकी बनी तथा रत्नोंके जड़ वमें चित्र विचित्र मालूम होती थीं ॥ ७१ ॥ फिर सबोने सीताकी उस कणशृङ्खलाको देखा, जो सुवर्णकी बनी तथा रत्नजटित थी और उसमें भी माणिक्यके गुच्छे लटक रहे थे ॥ ७२ ॥ कानसे लेकर सीमन्त पर्यन्त ललाटके बगल-बगल स्वर्ण मणियमयके आभूषण हारके समान मालूम पड़त थ ॥ ७३ ॥ इसके अनन्तर सबन्न नांताक मस्तककी ओर देखा, जहाँ केशमें सूर्य और चन्द्रमा दिखाई पड़ते थे। वे भी सुवर्ण-रत्न-वैदूर्यमणि-मुक्ताम विचित्र थे ॥७४-७५॥ नीलम कन्मारे कांत्यादिक मणियाने वे कतिबय शोभित हो रह य, वे अपनी अनुपम कान्तिसे दूसरे सूर्य-चन्द्रमाके समान दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे ॥७६॥ ललाटम रत्नों और मणि-मुक्ताओंस बना हुआ तिलक था। वह भी सुवर्णका बना था और कोटि सूर्यक समान उसका प्रकाश था ॥ ७७ ॥ इसके अनन्तर उन्होंने सीताके सीमन्तमें अतिशय दीप्तिमान् एक चूड़ामणि देखा, जो वेणीसे लेकर तिलक पर्यन्त अपनी छटा दिखा रहा था ॥ ७८ ॥

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