श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 323 of 811
Read in contextसर्गः ४ ] उत्तरकाण्डम् २०७
चतुर्थः सर्गः
( वाल्मीकिके आश्रममें लव-कुशका जन्म )
श्रीरामदास उवाच
अथ गङ्गातटं गत्वा लक्ष्मणोऽचिन्तयद्धृदि । स्वेच्छया कौतुकास्मीनौ मया शुद्धां स त्यक्तवान् ॥ १॥
स्वीयकामप्रशान्त्यर्थं शास्त्राज्ञां प्रतिपालयन् । एवं सति पुनस्तेन किं ममाज्ञापितं रहः ॥ २ ॥
वनात्सीताभुजं छित्त्वा नयस्वेत्यतिदुर्घटम् । मयापि शपथं बन्धा न पृष्टः स विचिन्त्य च ॥ ३ ॥
अधुना किं करोम्यत्र कथं रामं प्रगम्यते । सीताभुजं विना दृष्ट्वा रामो मां किं वदिष्यति ॥ ४ ॥
छेत्तुं सीताभुजं शक्तो भविष्यामि कथं त्वहम् । ययाऽहं पुत्रवन्नित्यं पालितो लालितस्त्वपि ॥ ५ ॥
अधुनाऽग्निं विशाम्यत्र रामापास्यं न दर्शये । एवं निश्चित्य सौमित्रिश्चितां कर्तुं मनो दधे ॥ ६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र विश्वकर्मा विधेर्गिरा । कुठारहस्तो विपिने बभ्राम तक्षकपृथक् ॥ ७ ॥
तं दृष्ट्वा लक्ष्मणः प्राह त्वं मे साहाय्यमाचर । कुठारेण तरूंश्छित्त्वा चितार्थं देहि मां जवात् ॥ ८ ॥
यथेष्टं वस्तु दास्यामि त्वामहं नियमेन हि । सोऽप्याह लक्ष्मण वीर चितार्थं वदस्व माम् ॥ ९ ॥
सौमित्रिः कथयामास पूर्ववृत्तं सविस्तरम् । तच्छ्रुत्वा मद्दल तक्षः सौमित्रिं प्राह सस्मितः ॥ १० ॥
अल्पार्थे स्वोपकुरुष मा मुञ्चस्व स्वमायुज । अहं सीताभुजं कृत्वाऽधुना दास्यामि ते क्षणात् ॥ ११ ॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणं कृत्वा जानकीभुजमुत्तमम् । सद्रुर्मामास्थिनायुक्तपूरितं कञ्चुकोयुतम् ॥ १२ ॥
सीतालङ्कारसहितं सद्यश्चाविर्विवाहिनम् । ददौ लक्ष्मणहस्ते तं स्वयमन्तर्दधे क्षणात् ॥ १३ ॥
सीताभुजं समादाय लक्ष्मणोऽपि पुरीं ययौ । गतश्रियं निरुत्साहां वात्यातितृणितुशराम् ॥ १४॥
ददर्श नगरीं स्वीयां नारीहीनगृहोपमाम् । विवेशाथोसृजः सूर्य नत्वा महसि राघवम् ॥ १५॥
श्रीरामदास बोले उत्तर गङ्गातट के समीप पहुंचकर लक्ष्मण अपने मनमें सोचा कि यद्यपि लङ्कासे लौटनेपर मैंने ही अग्निमें डालकर सीताको पवित्र किया था। फिर भी रामचन्द्रजीने सीता माताका परित्याग कर दिया है ॥ १ ॥ इसका दो कारण है। एक तो रामचन्द्रजीको अपनी कामवासना कम करनी है, दूसरे शास्त्रकी आज्ञाका पालन करना है। परन्तु, रामके आज्ञानुसार मैने सीताका परित्याग तो कर दिया, किंतु एक और आज्ञा थी कि 'लौटते समय सीताकी एक भुजा भी काटकर लेते आना'। यह बहुत ही कठिन काम है। उस समय रामजीने कसम रचा दिया था, इसलिए विशेष बातचीत भी नहीं कर सका ॥ २ ॥ ३ ॥ अब मैं क्या करूँ ? कैसे प्रभुक पास लौटकर जाऊँ ? सीताके बिना हाथ लिये मुझे लौटते देखेंगे तो क्या कहेंगे और फिर यदि हाथ काटना चाहूँ तो कैसे काटूँ । जिन्होंने अपने बच्चेके समान मेरा दुलार किया, उन सीताके साथ यह कस ईका काम करनेके लिये मैं क्योंकर आगे बढ़ सकूँगा ॥ ४ ॥ ५ ॥ इसलिए सबसे अच्छा उपाय यह है कि यहीं आगमे जलकर मर जाऊँ। रामको मुंह ही न दिखाऊँ तो अच्छा हो । इस प्रकार विचार करके लक्ष्मणने चिता बनानेका निश्चय किया ॥ ६ ॥ इसी बीचमें ब्रह्माके आज्ञानुसार विश्वकर्मा एक बढ़ईका रूप धारण करके हाथमें कुल्हाड़ी लिये वनमें घूमते फिरते वहाँ आ पहुंचे । ७ । तब लक्ष्मणने उससे कहा—कृपया आप अपनी कुल्हाड़ासे थोड़ीसी लकड़ी काटकर मुझे चिता बनानेको दे दीजिये ॥ ८ । आप जितना धन माँगेंगे, दूँगा। बढ़ईने कहा—हे वीर आप अपने लिये चिता बनानेका कारण तो हमें बताइये ॥ ९ । लक्ष्मणने आद्यन्त अन्ततक सारा वृतान्त बता दिया। उसे सुनकर मुसकराते हुए विश्वकर्माने कहा ॥ १० ॥ इतनी सी बातके लिये आप अपने इस बहुमूल्य शरीरको आगमें मत जलाइये। मैं अभी क्षणभरमें सीताका हाथ बनाकर आपको देता हूँ ॥ ११ ॥ तदनुसार तनिक ही देरमें विश्वकर्माने सीताका ऐसा हाथ बना दिया, जिसपर रुधिर बह रहा था, मांसके लोथड़े झूल रहे थे और कञ्चुकी चढ़ी हुई थी ॥ १२ ॥ सीताके उस हाथमें सब चिह्न विद्यमान थे और अलङ्कार पड़े थे। उस हाथको लक्ष्मणके हाथमें देकर विश्वकर्मा अन्तर्धान हो गये ॥ १३ ॥ तब लक्ष्मण वह भुजा लेकर अयोध्यापुरीकी