श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 324, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें३०८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
दर्शयामास सीताया भुजं कङ्कणमण्डितम् । तं निरीक्ष्य भृतं रामोऽधोमुखः प्राह लक्ष्मणम् ॥ १६॥ कैकेयीं सुहृदः पौरान्त् सर्वान् जानपदान् बहून् । सीताभुजां दर्शनीयस्त्वयाऽद्य मम शासनात् ॥ १७॥ तथेत्युक्त्वा लक्ष्मणोऽपेमं चकार यथोदितः । भुजं संस्थापयामास पेटिकायां निधाय सः ॥ कैकेयी तं भुजं दृष्ट्वा तुतोष नितरां हृदि । १८॥ रामोऽपि सीतारहितः परात्मा विज्ञानहस्तस्त्वथ चादिदेवः । मत्स्येव भोगानखिलान्विरक्तो मुनिव्रतोऽभून्मुनिसेवितांघ्रिः ॥ १९॥ अथ सीताऽपि वाल्मीकेर्मुनिपत्नीभिगाश्रमे । प्रत्यहं पूजिता वन्यैः सुखं तस्यौ मुदान्विता ॥ २० ॥ एवं मासद्वयं तत्र नीत्वा सीताऽऽश्रमे मुनेः । सुदिने सुषुवे रात्रौ पुत्ररत्नं रविप्रभम् । २१॥ एतस्मिन्नन्तरे रात्रौ ज्ञात्वा तं ससखं प्रभुः । राघवः किङ्किणीमालाघटां शुश्रावऽथ वपुना ॥ २२॥ पुष्पकस्य ततस्तस्मिन् स्थित्वाऽकाशपथा ययौ । वाल्मीकेराश्रमे वेगाल्लक्ष्मणञ्चानं ननाम सः । २३॥ ततो वाल्मीकिना विप्रैर्गर्भनेरेव रघूत्तमः । जातकमादिसंस्कारांश्चकार विधिपूर्वकम् ॥ २४॥ मातायाः पुरतः पुत्राननमलोकयन्मुदा । ददौ दानान्यनेकानि वस्त्रस्वाभरणान्यपि । २५॥ चकार विविधन्नाडं पुत्रजन्महडोत्सवे । देवदुन्दुभयो नेदुर्देवर्षूः पुष्पवृष्टिभिः । २६॥ सुराः सीतां शिशुं रामं ननृतु खे सुरस्त्रियः नेदुर्जनकवायानि ननृतुर्वारयोषितः ॥ २७॥ तुष्टुवुमागधाद्याश्च सीतां रामं शिशुं मुहुः । ऋषिपत्न्यः शिशुं सीतां रामं दीपः प्रपूषितः । २८॥ प्रथैर्नीराजनं कृत्वा जगुर्गीतं हि सुस्वरम् । वस्त्राद्यैः पूजयामास ताः प्रत्रा रघुनन्दनः ॥ २९॥ सीतारामौ विदेहोऽपि पूजयामास विस्तरान् । वाल्मीकिस्तु कुतं. शांतिं चकार विधिना शिशोः ३०॥
कर चल पड़े। अयोध्यामें घुसते ही लक्ष्मणने देखा कि, 'एव ही दिनमें अयोध्यापुरी सर्वथा श्रीहीन हो गयी है। उनिहूँ ... उठ रहा है और चारों ओर उदासी दीखती है। यह सब देखकर उस दिन अयोध्यापुरी ऐसी लग रही थी, जैसे बिना स्वाका दिना घर । लक्ष्मण जान जाते महलोंमें पहुंचे और २ मचन्द्रज को सोताका हाथ दिखलाया। उस कङ्कण विभूषित सीताके भुजाको देखकर रामने अपना मुस नीचा किया और- १४-१६। इस न जाकर माता कैकेयी, मेरे मित्रो, राजाओं एवं पुरवासियो- को दिखला दो, यह मेरी आज्ञा है॥ १७ । 'तथास्तु' कहकर लक्ष्मणने भी आज्ञाका पालन किया और एक पेटामे सम्हालकर सीताकी भुजा रख ली। १८॥ कंकणन माताका भुजा देखा तो बहुत प्रसन्न हुई। इधर र मचंद्रजीने सासस वियुक्त होकर सब सांसारिक भोगाक त्याग दिया और तपस्वियोके समान अपना जीवन विताने लगे, १९॥ उधर मलाजी भी वल्मीकिके आश्रमपर वहाँकी मुनिपत्नियोंस पूजित होती हुई सानन्द जीवन विताने लगीं ॥ २०॥ इस तरह दो महीना बीतनेपर साताने शुभ दिन और शुभ घड़ीमें एक पुत्ररत्नका जन्म दया ॥ २१॥ उसी समय गभनन्दका था यह समाचार मिल गया और रात्रिको अपन पुष्पक विमानपर चढ़कर लक्ष्मणजीक साथ आकाशमार्गस श्रीवाल्मीकिजीके आश्रमपर जा पहुंचे और लक्ष्मण तथा रामने मुनिका प्रणाम किया। २२। २३॥ इसके अनन्तर वाल्मीकिने आश्रममें उपस्थित बड़े२ ब्राह्मणोंक साथ बन्लक विधिवत् जातकर्मादि संस्कार किया ॥ २४ ॥ सीताक समझ राम- चन्द्रने हर्षपूर्वक बेटेका मुख देखा और अनेक प्रकारक वस्त्र-आभरण आदि दान करके ब्राह्मणोंको दिये ॥ २५ ॥ उस पुत्र-जन्मके प्रसन्नताम रामने नान्दीमुख-श्राद्धादि किया। देवताआन प्रसन्न होकर दुन्दुभी बजायो और उनपर फूल बरसाये । २६॥ सीता और साताके पुत्रका मुख देखकर देवांगनाय नाचने लगीं । उधर जनकजाक द्वारा नियुक्त बजाये बाजा बजाने लगे और वेश्याएं नाचन लगीं । २७॥ वन्दीजन सीता और रामका स्तुति करन लगे । ऋषिपत्नियोंने सुन्दर थालमें दीपक टपक जलाकर राम, सीता तथा नवजात शिशुक आरती उतारी और विविध प्रकारके मङ्गलगान गाये । रामन अनेक तरहके वस्त्र, भूषणोंसे उनका सत्कार किया ॥ २८ ॥ २९ ॥ महाराज जनकने भी राम और सीताका विधिवत् पूजन किया और वाल्मीकिने