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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

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सर्गः ४ ] जन्मकाण्डम् ३०९

शान्त्यर्थं प्रोक्षितो दम्भाङ्कुरुतैर्ब्राह्मणैस्ततः । सर्वार्थिनां शमार्थाय निर्मितो बालकृन्त्य हि ।३१। एवं नानाममुन्नीय नीत्वा तत्र निशां सुखम् । प्रत्युषस्य मुदानाह समत्रागमनस्य हि ।३२। दस्माद्वार्ता बहिर्गच्छेद्धाभपादस्य वै मुनेः । स यं दण्ड्यो भवेदेव शङ्कारूपा न संशयः । ३३। इत्युक्त्वा सकलांस्तृष्टा मुनीन्नत्वा पुनः पुनः । सीतामादाय श्रीरामो यान भ्रात्राऽऽरुरोह सः ॥३४॥ विहायसा क्षणात्प्राप साकेतं रघुनन्दनः । प्रवरेश विपानास्य पुरप्रविद्रिता गृहे ॥३५॥ अथ रामो वाजिमेधशतं कर्तुं मनो दधे । कृत्वा सौवर्णमयीं सीतां नानालङ्कारभूषिताम् ॥३६॥ पापिनीं मलिनां दुष्टां भर्तृनिन्दापरायणाम् । भर्तुर्विद्वेषिणीं शूरां चांशुकमातृ तन्मनाम् ॥३७॥ भर्तारं घातुमिच्छन्तीं सदा कलहकारिणीम् । बन्धुक्तां दारुणां भर्तुर्विपरीतार्थगामिनीम् ॥३८॥ स्वीयेच्छानुवर्तिनीं नष्टां मृतां नांतो गतां श्रियम् । त्यक्त्वा कुशमयीं विप्रैः कार्या पत्नी स्वकर्मसु ॥३९॥ हैमी कार्या क्षात्रैश्च वैश्यैः कार्या तु राजती । शूद्रैः कार्या ताम्रमयी स्वस्वकर्मप्रसिद्धये । ४०॥ अथवा सर्ववर्णैश्च कार्या पत्नी तु कांचनी । रामोऽपि कृत्वा सौवर्णीमग्निहोत्रं चकार सः । ४१। रावणेन यदा नीता सीता सा दण्डके तदा । हेम्नोऽभावात्कुशमयी कृता रामेण जानकी ॥४२॥ अन्ये कुशमयीं पत्नीं विधाय गृहमेधिनः । अग्निहोत्रमुपासन्ते विरहस्यानलोग्नर्हितः ॥४३। व्यभिचारवती पाषा भर्तुर्विद्वेषिणी तथा । अभाने वा परित्याज्यान वान्येऽप्या सर्वतोऽश्राद् । ४४॥ पक्षे पक्षे नवम्यां हि एकनं शरभृथाविधम् । कर्तुं निश्चितवान् रामस्तदा विप्रैः पुरोधसा ॥४५॥ भागीरथ्युत्तरे तीरे यज्ञभूमिं चकार सः । श्रयथाच्छाम्मुद्गलस्याश्रामो यावदुद्द दक्षिणे ॥४६॥


विधिपूर्वक कुशासे अभिषेक करते हुए शार्डित-बाट किया ॥ ३० ॥ बालिकाके निमित्त दाहिनाकिन कुशासे शान्ति की थी। इसीलिये उन्होंने रामक सामच ही उस बच्चाका नाम कुश रक्खा ॥ ३१ ॥ इस तरह नाना प्रकारके उत्सवमें वह रात वहीं बितायी और पिछली रातको रामने आश्रमके लोगोंसे कहा कि जो कोई मनुष्य मेरे यहाँ आनेका समाचार किसोसे कहेगा, वह मेरा शत्रु होगा और मैं उसको दंड दिये बिना न रहूँगा ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ ऐसा कहकर सबने सबाथका याराम आनन्द लिए लोटने लगे। सीता और मुनियोंको प्रणाम किया। फिर सीताम एटककर रामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ विमानपर आरूढ़ हुए और थोड़ा देरम अयोध्या जाकर नियतका दृष्टि अपना अरण्यपर सा गया ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ कुछ दिन बीतनेके बाद रामने ही अश्वमेध यश करनेका विचार किया । उस समय सीता तो था नहीं । इसलिए रामने सुवर्णकी सीता बनाकर यज्ञ करना निश्चित किया । क्योंकि शास्त्रमें लिखा है कि पापिन मैली कुचैली, दुष्ट स्वभावकी, निन्दा करनेवाली, पतिसे लडाई करनेवाली, क्रूर प्रकृतिक्री, चोट्टिन, स्वामीको मारनेकी इच्छा रखनेवाली, सदा लडाई करनेवाली, कुलटा, स्वामीके बताये प्रतिकूल चलनेवाली और स्वच्छन्दाचारिणी स्त्री यदि खो जाय, मर जाय या किसीके द्वारा भगा ली जाय अथवा स्वर्ग प्राप्त जाय तो उसको त्यागकर ब्राह्मण कुशकी क्षत्रिय सुवर्णकी, वैश्य चाँदीका और शूद्र ताम्बेकी स्त्री बनाकर यज्ञ द्वि कर्म करे ॥ ३६-४० ॥ अथवा सामर्थ्य अनुसार सब जातिके लोग सुवर्णकी नारी बनाकर अपना काम चलायें । इन्हीं शास्त्रीय आज्ञाओंस रामने सुवर्णकी सीता बनाकर अपना यज्ञ प्रारम्भ किया ०४१ ॥ पहले जब दण्डक वनमें सीता हर ली गयी थी और रातको रामेश्वर स्थापनके समय साताकी आवश्यकता पडी थी, तब उन्होंने सुवर्णके अभावसे कुशकी ही सीता बनाकर रामेश्वरका स्थापन का थी ॥ ४२ ॥ कुछ गृहस्थ नारीके अभावमें कुशकी स्त्री बनाकर अग्निहोत्र करते हैं, वह भी ठीक है। कहनेका मतलब यह कि स्त्रीके अभावमें किसी प्रकारकी स्त्री अवश्य बना लेनी चाहिए। क्योंकि स्त्रीके बिना कोई भी याज्ञिक कार्य सम्पन्न नहीं होता । कुछ आचार्योका मत है कि - "व्यभिचारिणी, पापिनी तथा स्वामीसे द्रोह करनेवाली स्त्रीका सदाके लिए परित्याग कर देना चाहिए' कुछका यह मत है कि "परित्याग न भी करे तो कोई हानि नहीं" ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ रामने प्रत्येक नवमीको एक अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करनेका निश्चय किया और भागीरथीके उत्तरी तटपर यज्ञशाला बनानेकी बात