श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 35, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ३] सारकाण्डम् १९
रक्षणाय निजंः संम्प्रेवेक्षयित्वा मपन्नतन् । तथेति ते मन्त्रिणश्च ययुर्वेगेन जानकीम् ॥१३७॥ प्रोच्चुस्ते मधुरं वाक्यं प्रयद्धस्तम्पुटाः । हे सीते कञ्जनयने धन्याऽसि मजगामनि ॥१३८॥ रविगोत्रोद्भवेनाथ दशरथसुतेन च । रामेण भर्त्रा सदसि चापमुत्सृष्ट भग्नतः ॥१३९॥ करिणीगृहमारुह्य राम्रं त्वं गन्तुमर्हसि । रामकण्ठोपवेश्याय रत्नमालां मुदान्विता ॥१४०॥ हन्मन्त्रिणां वचः श्रुत्वा सीता नत्वा स्वमातरम् । ससखीभिः काञ्चीपुटं संस्थितासीन्मुदान्वित ॥१४१॥ तदग्रे नद्यवाद्यानि निनेदुर्मधुरानि वै । निनेदुः पृष्ठभागेऽपि नानावाद्यानि वै मुहुः ॥१४२॥ चित्रार्णपट्टः कञ्चकिनः शतशो वेत्रपाणयः । संनिवारयिष्याञ्चाग्रे ते वृद्धबुद्धीपैर्निःस्वनाः । १४३। राशयन् जनसंमर्द सीतां द्रष्टुं जनैः कृतम् । ननृतुर्वागनायैश्च बभूवुस्तंत्रनिःस्वनाः । १४४॥ तुष्टुवुर्मगधाश्चाश्च नटा गानं प्रचक्रिरे । करिणीं वेष्टयामासुः सीतादास्र्यः सहस्रशः ॥१४५॥ अश्वाहरूढामशार्दि बिभ्रन्त्यो रूपशोभिताः । ततोऽश्वसंस्थाः शतशस्ना ययुश्चोपमावराः ॥१४६॥ जग्मुः शस्त्रधारिण्यः वृद्धवेत्रसंयुक्ताः । ततः पुरुषवेषधारिन्यस्त्वन्यः प्रमदोत्तमाः । १४७। ययुस्तञ्चल्यः शतशः शस्त्रहस्ताः सुभूषिताः । गोपित्तमुख्याः कञ्चकिन्यस्तुरगादिषु संस्थिताः ॥१४८। ततस्ते मन्त्रिणः सर्वे न जावहनसंस्थिताः । स्वयं पर्यवेष्टयामासुः सीतायाः करिणीं मुदा ॥१४९। चामरं न्यर्जनैः सव्ये मुहुः मानामवीतयन् । स्त्रियो गवाक्षरण्ध्रेभ्यो सीता पुष्पैर्वाकिरन् ॥१५०। एवं नानाममुत्साहैः शनैः सीता तडिद्रभा । नवरत्नमयीं मालां बिभ्रती दक्षिणे करे ॥१५१॥ राभं नेत्रकटाक्षैश्च पश्यन्ती मुदितानना । समापं राघव गत्वा करिपथादवरुह्य च ॥१५२। शनैः पद्धयां ययौ राम्र तद्ग्रावापा सुलज्जिता । मुमोच निजबाहुभ्या रत्नमाला मुदान्विता ॥१५३। चकार नमनं राम्रं पादयोः स्थाप्य वै शिरः । तस्याश्चाङ्गुष्ठमी माता सभायामर्तिलज्जिता ॥१५४॥
अपने मान्यवानां आज्ञा दी कि सुन्दर हस्तिनपर बैठकर हेनाया दशनरथम आाग हुइ सब सीतावायन माता ॥ १३७ ॥ 'बहुत अच्छा कहकर मन्त्रगण तुरन्त जनकजाके पास गयेया । हाथ जोडकर इस प्रकार मधुर वाणीमें बहुत गीत बजाताभना और कमलनयना माता तुम धन्य हो ॥ १३८ ॥ सूर्यवंश दशरथपुत्र रामने सभामे धनुष तोड डाला । अभी उठकर अभी ही आजाओ ॥ १३९ ॥ हस्तिनीपर चढ़कर अभी रामके पास चलना है। वहां चलकर आनन्दपूर्वक उनके गलेमें यह रत्नमाला आदरपूर्वक पहनाना ॥ १४० ॥ सीताने मन्त्रियोंका इस वाक्यको सुनकर मानाके चरणोमें नमस्कार किया और सहेली सुखियोंके साथ हस्तिनीका पाहुपर सवार हो गयीं ॥ १४१ ॥ इनके आगे तथा पीछे नाना प्रकारक मनोहर बाजे बजने लगे ॥ १४२ ॥ रङ्ग-बिरङ्गा पगड़ीया बाँध और हाथमें बंत लिये अन्तःपुरके संकटां दरबान हस्तिनीके अग्रे आगे आगे खिझलाते हुए चलने लगे ॥ १४३ ॥ व सम्भ्रम सीताको देखनेके लिये खड़ा भीड़को हटा रहे थे। वेश्याये नाचने लगीं । विविध वाद्यके निनाद होने लगे, भाट स्तुति करने और नट गान लगे। सीताकी हजारो दासियान उन्हें घेर लिया ॥ १४४ । १४५ ॥ उनके पीछे अश्वपर सवार तथा सुवर्णभूषित वस्त्र आदि लिये हुए बहुतसी स्त्रियां तथा उनके पश्चात् सर्वोत्कृष्ट उपमाताओ ( धाइयों ) चली ॥ १४६ ॥ उनके पीछे अस्त्रधारिणी तथा हाथमें छड़ियाँ लिये हुए सैकड़ो वृद्धा स्त्रियां चलीं ॥ उनके बाद जवान स्त्रियें पुरुषका वेष बनाये और हाथमें शस्त्र लिये हुए चलीं । उनके बाद उषा वेषमें मुख ढांके और कुरता पहिने हुए, घोड़ेपर सवार होकर शस्त्र लिये हुए वृद्ध सुन्दरी स्त्रियें चलीं ॥ १४७॥ १४८ ॥ सबके पीछे विविध वाहनांपर सवार मन्त्रिगण अपनी-अपनी सेनाके द्वारा सीताकी हथिनीको घेरे हुए चले ॥ १४९ ॥ सखाराम पंवर तथा पंख सीताजीपर डुलाने लगे। नगरकी स्त्रियां गवाक्षमार्गसे उनपर फूल बरसाने लगीं ॥ १५० ॥ इस तरह अनेक प्रकारके सज्जधजकर धीरे-धीरे बिजलीके सदृश दीप्तिवाली तथा दाहिने हाथमें नवरत्नोंका हार लिये हुए अपने नेत्रकटाक्षोंसे रामको देखती हुई सीता सभाखण्डके पास आ तथा हथिनीसे उतरकर धीरे धीरे रामके पास गयी और लज्जापूर्वक अपने हाथोंसे उनके गलेमें वह रत्नोंकी माला डाल दी ॥ १५१-१५३ ॥