भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः १] सारकाण्डम् ३५

कल्पयामास विधिवन्मुनींश्चापि सपूरुषम् । गतो गाधिसमादेशेन दिशेह प्रेष्य मन्त्रिणः ॥१७२॥ समानेतुं दशरथं सप्रतीक्षां चकार सः । तेऽपि गत्वा म.ऽशश्व दृष्ट्वा दशरथं नृपम् ॥१७३॥ वृत्तं निवेद्य सकलं तं नत्वा सम्पुरःस्थिताः । वृत्तं दशरथः श्रुत्वा तुतोष नितरां तदा ॥१७४॥ सैन्येन नागरैः सर्वैः स्रिविजनैर्दलैः सह । मिथिलायामथोत्थाय तदा दशरथो नृपः ॥१७५॥ तदा महोत्सवनेनैव नृपं दशरथं पुरम् । नेतुं गजं पुरस्कृत्य जनकराः साश्विरंययौ ॥१७६॥ तदा दशरथाग्रे तौ दृष्ट्वा कैकेय्यासुतौ । श्रीरामलक्ष्मणावरजौ जनः प्राप्तौ व्यचिन्तयत् ॥१७७॥ तावद्रामलक्ष्मणाभ्यां युक्तं तं गाधिजं मुनिम् । स्वसेनायां नृपो दृष्ट्वा विस्मयं प्राप संस्थितः ॥१७८॥ ततो दशरथं नत्वा वसिष्ठं प्रणिपत्य च । गाधिजं जनकः प्राह कावेतौ रामरूपिणौ ॥१७९॥ ततस्त्वं गाधिजः प्राह रामौङ्गाद्भरतस्त्वयम् । लक्ष्मणाङ्गाच्च शत्रुघ्नः कैकेय्या नन्दनाविनौ ॥१८०॥ तच्छ्रुत्वा जनकः प्राह राजानं गाधिजं गुरुम् । सीतां रामाय दास्यामि लब्धां भूमवयोनिजाम् १८१॥ दैवज्ञोर्मिलानाम्नीं लक्ष्मणायार्पयान्यहम् । कुशध्वजस्य मे बन्धोः श्रुतकीर्तिश्च मांडवी १८२। वर्तेते बालिके रम्ये रूपयौवनमण्डिते । सीतोर्मिलाभ्यामपि ये मया नित्यं प्रसाधिते ॥१८३॥ दास्याम्यहं भरताय मांडवीं मंडनान्विताम् । शत्रुघ्नाय श्रुतकीर्तिमर्पयान्यकमादरात् ॥१८४॥ एवं स्नुषाश्चतस्रश्च सर्वमङ्गलक पावित् । तथेति जनकं प्राह राजा दशरथो मुदा ॥१८५॥ ततो दशरथः प्राह शतानन्दं पुरोहितम् । अहल्याजठरोद्भूतं मैथिलाग्रे स्थितं मुनिम् ॥१८६॥ कथं लब्धा भुवः सीता वृत्तमेवं वक्तुमर्हसि । शतानंदस्त्वथैवंयुक्तोऽब्रवीद्दशरथं नृपम् १८७॥ शतानन्द उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया राजन् शृणुष्वैकाग्रमानसः । आसीन्नृप नृपः कश्चित्पद्माक्ष इति विश्रुतः ॥१८८॥

रामके लिये, मुनियोंके लिये तथा सब लोगके लिए सब प्रकारकी वस्तुओका यथोचित प्रबन्ध कर दिया ॥१७२॥ तदनन्तर विश्वामित्रके कहनेपर राजा जनकने अवधेश महाराज दशरथको बुलानेका निश्चय करके मन्त्रियोंको अयोध्या भेजा । तद न्पार वे राजा दशरथके पास गये और सब वृत्त.न्त निवेदन करके बाद नमस्कार करके सामने खड़े हो गए । इस वृत्तान्तको सुनकर राजा दशरथ बहुत प्रसन्न हुए ॥१७३-१७४॥ फिर राजा दशरथ स्त्रियोंको लेनाके, नगर तथा देशके सब लोगोको साथ लेकर आनन्द-पूर्वक साथ मिथिलापुरीको चल परे ॥१७५॥ उधर राजा जनक बड़े समारोहपूर्वक बाजेगाजेके साथ एक हाथीको सजाकर सब राजाओक संग उनकी अगवानीके लिए सामने आये ॥१७६॥ महाराज दशरथके आगे कैकेयीके पुत्र भरत तथा शत्रुघ्नको देखकर राजा जनक विचारने लगे कि वे राम-लक्ष्मण यहाँ कहाँसे आ गये। तावत् जब विश्वामित्रके साथ राम-लक्ष्मणको अपनी सेनामे देखा तो आश्चर्यचकित होकर राजा जनकने महाराज दशरथ और मुनि वसिष्ठको प्रणाम करके विश्वामित्रसे पूछा कि ये दोनों राम-लक्ष्मण-के समान रूपवाले दूसरे बालक कौन हैं ? ॥१७७-१७९॥ विश्वामित्रजीने उत्तर दिया कि रामके अङ्गस्वरूप भरत तथा लक्ष्मणके अंश शत्रुघ्न ये दोनों कैकयीके पुत्र हैं ॥१८०॥ यह सुनकर राजा जनक गुरु विश्वामित्र तथा राजा दशरथसे कहने लगे कि अयोनिजा (योनिसे नहीं उत्पन्न) तथा पृथ्वीसे प्राप्त सीताको मैं रामके लिए देता हूँ तथा शरीरसे उत्पन्न उर्मिलाको लक्ष्मणके लिए दे रहा हूँ। उसे आप ग्रहण करें। मेरे भाई कुशध्वजकी श्रुतकीर्ति तथा माण्डवी नामकी सुन्दर तथा रूपयौवनसे सम्पन्न दो कन्याएँ हैं। जिनको कि सीता तथा उर्मिलाके साथ-साथ बालकर मैनें बड़ी की है ॥१८१-१८३॥ उत्तम भूषणोसे भूषित मांडवीको भरतके लिए तथा श्रुतकीर्तिको शत्रुघ्नके लिए देता हूँ, हे पार्थिव ! आप इन चारो-शुभ-वधुओको स्वीकार करें। तब राजा दशरथने सहर्ष 'तथास्तु' कहा ॥१८४॥१८५॥ तदनन्तर राजा दशरथने राजा जनकके सामने खड़े अहल्याकी कोखसे उत्पन्न पुरोहित मुनि शतानन्दसे पूछा कि सीता धरणीरस कैसे प्राप्त हुई। सो सब वृत्तान्त आप कहें। शतानन्दने 'बहुत अच्छा' कहकर बताना आरम्भ किया ॥१८६॥१८७॥