भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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२२आनन्दरामायणे[ सर्गः ३

स दृष्ट्वा सकलाँल्लोकान् लक्ष्मीकार्मुकतत्परान् । चिंतयामास मनसि लक्ष्मीं कन्यां करोम्यहम् ॥१८९॥
वयमेव निजांके तां लालयामि निरंतरम् । इति निश्चित्य स नृपस्तप्तवांस्तीव्रं महत्तपः ॥१९०॥
दृष्ट्वा प्रसन्नतामग्र तु लक्ष्मीं वचनमब्रवीत् । दुहिता मे भव त्वं हि सा प्राह नृपतिं प्रति । १९१॥
परतन्त्राऽस्म्यहं राजन् विष्णुं त्वं प्रार्थयाधुना । स चेद्दास्यति मां ते हि तर्ह्यहं दुहिता तव ॥१९२॥
भविष्यामि न संदेहोऽथैवं प्रकथ्य नृपः पुनः । तप्त्वा तीव्रं तपो विष्णुं चकार परमोन्मुखम् । १९३॥
लब्ध्वा तं नृपतिः प्राह देहि कन्यां रमां मम । तद्राजवचनं श्रुत्वा मातुलुङ्गफलं हरिः ॥१९४॥
पद्माक्षाय ददौ श्रेष्ठं स्वयमन्तर्दधे विभुः । तद्भित्त्वा नृपतिः कन्यां ददर्श कनकप्रभाम् ॥१९५॥
तां दृष्ट्वा चाभिलाषः स कन्यां मेने निजां शुभाम् । पद्माक्षनृपतेः कन्यां पद्मा लोका वदंति च । १९६॥
आह्लादयन्तीमुत्तमां रम्यां नवतिर्नर्तकं जनान् । शकले मातुलुङ्गस्य भूत्वैकत्र फलं पुनः ॥१९७॥
जातं दृष्ट्वा दधावथ स्वहस्ते नृपतेः सुता । सा व्यवर्धत नृपतेरङ्के चंद्रकला यथा ॥१९८॥
शुक्लपक्षे च तां दृष्ट्वा वयःसन्धिवितन्वतीम् । कस्मै देया मया कन्या कस्यै योग्यो वरोऽत्र कः १९९॥
ततः समंत्र्य नृपतिः स्वयंवरमथाऽग्रभीत् । स्वयंवरेऽथ पद्माया यज्ञारम्भं चकार सः ॥२००॥
स्वयंवराय यद्वाथ पत्रिकांकारयन्नृपान् । तेऽपि शृङ्गारयुक्ताश्च ययुः पद्मास्वयंवरम् ॥२०१॥
पद्मास्वयंवरं श्रुत्वा ययुस्तत्र मुनीश्वराः । ययुर्देवाः सगंधर्वा दानवा मानवाः खगाः । २०२॥
नगा नद्यः समुद्राश्च भूरुहाः कामरूपिणः । ययुर्यक्षाः किन्नराश्च राक्षसा रावणादयः ॥२०३॥
सर्वान् समागतान् दृष्ट्वा पद्माक्षः प्राह तान् प्रति । आकाशनीलवर्णेन यः स्वांगं परिलेपयेत् । २०४
ददामि तस्मै पद्मेयं सत्यं ज्ञेयं वचो मम । तद्राजवचनं श्रुत्वा दुर्घटं नृपसत्तमाः । २०५॥


शतानन्द बोले हे राजन् आपने जो वृतान्त पूछा सो बहुत अच्छा किया । मैं कहता हूँ आप ध्यानसे सुन । पूर्वकालमें पद्माक्ष नामका एक प्रसिद्ध राजा था ॥ १८८ ॥ उसने सब लोगोंको लक्ष्मीकी कामनामें तत्पर देखकर मनमें सोचा कि मैं साक्षात् लक्ष्मीको पुत्री बनाऊं और अपनी गोदमें लाडप्यार करके बड़ी करूँ । ऐसा निश्चय करके उसने लक्ष्मीको प्राप्त करनेके लिए बड़ा कठोर तप किया ॥ १८६ ॥ १९० ॥ जब प्रसन्न होकर लक्ष्मी सम्मन आ खड़ी हुईं तो उसने कहा कि तुम मेरी पुत्री बनो । यह सुनकर लक्ष्मीने राजासे कहा ॥ १६१ ॥ हे राजन् ! मैं तो विष्णुभगवानके अधीन हूँ—स्वतन्त्र नहीं हूँ । इसलिए तुम विष्णुकी प्रार्थना करो । वे यदि मुझे तुम्हें दे देंगें तो मैं तुम्हारी पुत्री होऊँगी । इसमें सन्देह नहीं है 'अच्छी बात है' कहकर राजा पद्माक्षने तीव्र तप करके विष्णुभगवान्को प्रसन्न किया । १६२ ॥ १६३ ॥ विष्णुने उसे एक श्रेष्ठ मातुलुङ्गफल (बिजोरा नीबू अथवा नारङ्गीका फल) दिया और स्वयं अन्तर्धान हो गये । राजा पद्माक्षने उस फलको फाड़ा तो उसमें सुवर्णके समान जगमगाती कन्याको विद्यमान देखा ॥१९४॥१९५॥ कन्याभिलाषी राजाने बालिकाको देखकर उसे अपनी कन्या ही माना । सबरू चित्तको आनन्द देनेवाली उस रमणीय कन्याको देखकर वहाँके सब लोग भी सहर्ष 'यह राजा पद्माक्षका कन्या लक्ष्मी है' ऐसा कहने लगे । तभी उस विजोरेके टुकड़ोंका मिलकर फिर समूचा फल बन गया । यह देखकर राजाकी पुत्रीने उसे अपने हाथोंमें ले लिया । वह बालिका राजाके अंक (गोद) में शुक्लपक्षकी चन्द्रकलाकी भांति बढ़ने लगी । उसे देखकर राजाके मनमें चिन्ता हुई कि 'यह कन्या मैं किसको दूँ, इसके योग्य वर कौन है' ॥ १९६–१९९ ॥ तदनन्तर राजाने विचार करके उसका स्वयंम्बर रचाया । उसी स्वयंम्बरमें उन्होंने यज्ञ भी आरम्भ कर दिया ॥ २०० ॥ स्वयंम्बर तथा यज्ञके लिए निमन्त्रणपत्र भेजकर पद्माक्षने राजाओंको बुलाया । वे लोग शृङ्गार करके बड़े ठाठ-बाटसे पद्माके स्वयंम्बरमें आकर सम्मिलित हुए । स्वयंम्बरका समाचार सुनकर बड़े-बड़े मुनीश्वर, देवता, गन्धर्व, दानव, मानव, पक्षी और वैसा रूप धारण करनेवाले नग, पर्वत, नदी, समुद्र, यक्ष, किन्नर और रावणादि राक्षस भी वहीं आ पहुंचे ॥ २०१–२०३ ॥ उन सबको आया हुआ देखकर राजाने उनसे कहा कि जो