भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ६ ] विवाहकाण्डम् ३३५

भाण्डप्रच्छन्नं मन्निस्तेने रोदिता बालभावतः । अता यचदनदुकथ्य समानासुभ्ररन्तसम् ॥२३॥
इन्द्रेण बोधिताश्चापि तपोध्वंसं प्रते । मुनिथापि नपोनाशं दृष्ट्वा शापादिना तदा ॥२४॥
बिना शापेन तासां म दण्डं सम्प्रवत्तहृत् । यन्तवृहन्तामाश्रयन् जलदेवीः प्रचोदयत् ॥२५॥
तद्वाक्याज्जलदेव्यस्ता मध्याह्ने स्वीयमह्निभू । निन्युर्यत्र बलादेव यत्र केषां गतिर्न हि ॥२६॥
गंधर्वाः पन्नगा यत्र गतुं शक्ता न चामराः । तपोबलेन मुनिः स्वर्ग गतस्ता ह्यत्र संस्थिताः ॥२७॥
ताः सर्वा जलदेवीनां गेहे सम्बभूवुः प्रजाः । एतद् वृत्तान्तमद्भुतं प्राङ् राम मयप्रदम् ॥२८॥
ता पत्र जलदेवीनां जलाभ्यन्तरमण्डने । कुर्वन्ति नृत्यगीतानि तासां संश्रूयते ध्वनिः ॥२९॥
एवं राम यथा पृष्टं त्वया सर्वं मया तथा । तुभ्यं तवऽग्रे कथितं कुरु येन हितं भवेत् ॥३०॥
सर्वासामेव नागकन्यानां गांधर्वीणां तथा विभो । मुनिना चोदितश्चेत्थं तदा शीघ्रात्तदर्तिमूढः ॥३१॥
लक्ष्मणं प्राह मे चापमानयाद्य धन्विदिह । मुक्त्वा बाणमाग्यापि दर्शया देवीर्जलास्थिताः ॥३२॥
कन्यकाः पन्नगानां च तथा गंधर्वकन्यकाः । इति तद्वाक्यमाकर्ण्य स श्रुत्वा सौमित्रिरादरात् ॥३३॥
शीघ्रं चापं सत्तूणीरं ददौ राघवयं प्रति । ततः कोदण्डमुद्यम्य टणत्कृत्य रघूद्वहः ॥३४॥
शुरं जग्राह तूणीरं निजनामाङ्कितं शरम् । तदा चचाल धरणी चुक्षुभे चाम सागराः ॥३५॥
ववौ घोरतरो वायु क्षोभ्याश्च दिशोऽभवन् । तारा निपतुर्रवरजी दुदुवुर्वनचारिणः ॥३६॥
पर्वताः कम्पना आसन् यत्रकुलोऽह्वनं पनाः । तज्जन्मथ्या जलदेव्यस्ताः श्रुत्वा चापध्वनिं महत् ॥३७॥
भयभीताः समागम्यास्ताभिः सर्वाभिरादरात् प्रणम्यस्ताम्तदा राम बालिकास्तास्तु द्वादश ॥३८॥
राघवायार्पयामासुर्दिव्यभूषणभूषिता । राघवं जलदेव्यस्ताः प्रार्थयामासुरादरात् ॥३९॥
राम राम महाबाहोऽस्माभिरवदपराधितम् । तत्क्षमस्व रघुश्रेष्ठ मा मुंच स्वपतत्रिणम् ॥४०॥


सककर कहा-॥ २१ ॥ २२ ॥ इसीपर मुझे बड़ा मत आया करोग। किन्तु बालभावसे मुग्ध वे कन्याएं ऋषिके बात न मानी, दूषित अपराध करती रहीं। २४॥ मा ऋषिका तपाभंग करनक लिए उन कन्याओको उभाड़ दिया था। अब ऋषि ने अपने मनम विचार किया कि शापादि द्वारा इन्हें दण्ड दूनस अपनी तपस्या क्षीण होगी, इसी लिए बिना शापके दण्ड मिल जाय । जलदेवियाँ उन कन्याओंको पकड़कर अपने घर ले गयीं। जहाँ कि गन्धर्वा तथा पन्नगोंकी भी गति नहीं थी। अपनी तपस्या पूर्ण करके ऋषि स्वर्गको चले गये, किन्तु वे कन्याए इस सरोवरमे जलदेवियोंके पास अब भी विद्यमान हैं ॥ २५-२८ ॥ पहले यह एक आश्चर्यमयी घटना घट गयी थी। वे ही गंधर्बो और पन्नगोंकी कन्यायें जलदेवियोंके घरमें नाच रही हैं, उन्हींके गानकी मधुर ध्वनि सुनायी देती है। २७ ॥ २६ ॥ हे राम! आपने जैसा पूछा, मैंने कह सुनाया, अब आप ऐसा करिए कि जिससे उन कन्याओका कल्याण हो। इस प्रकार अगस्त्यजीकी प्रणाम सुनकर श्रीरामने कहा हे लक्ष्मण मेरा धनुष तो ले आओ। मैं क्षण भरमे उन गंधर्वी और नागकी कन्याओंको जलसे बाहर निकालूँगा। इस तरह रामकी बात सुनकर लक्ष्मणने तुरंत आदरपूर्वक तूणीर तथा धनुष लाकर रामको दे दिया। इसके अनन्तर रामने धनुष उठाकर टंकोर किया। ३०-३४ ॥ तदनन्तर उन्होंने तूणीरसे एक बाण निकाला, जिसपर रामका नाम लिखा हुआ था। इससे पृथ्वी डगमगाने लगी और समुद्र क्षुब्ध होकर सूखने लगा ॥ ३५ ॥ जोरोसे वायु चलने लगी, दसों दिशायें धूलस भर गयीं, सारे ग्रह टूटकर गिरने लगे, वनके जीव वन छोड़कर भागने लगे, संसारका पर्वत-वृन्द काँपने लगा, और मेघगण रक्तकी वर्षा करने लगा। उस सरोवरकी जलदेविया धनुषका घनघोर टंकोर सुनकर भयभीत हो गयीं । वे तुरन्त उन बारहो कन्याओंका अपने साथ लिये बाहर आयीं और प्रणाम करके दिव्य अलंकारोंसे विभूषित उन कन्याओंको उन्होंने रामको सौंप दिया ॥ ३६-३९ ॥ वे इस प्रकार स्तुति करने लगीं। उन्होंने कहा-हे महाबाहो राम ! हमनें जोअपराध किया है, सो आप क्षमा