श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 393, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ८] विवाहकाण्डम् ३७७
तावन्महस्रधा बाणैर्यूपकेतुश्चकार ताम् । ततो बदध्वा दृढां मुष्टिं कम्बुकण्ठस्त्वरान्वितः ॥७९॥
हृदये यूपकेतोश्च जघानाचलसन्निभाम् । तदा स यूपकेतुस्त्वं श्वशुरं स्यन्दनोपरि । ८०।।
ध्वजे बबन्ध वेगेन खङ्गं जग्राह सम्भ्रमात् । कंबुकण्ठशिरश्छेदं कर्तुं तं समुपस्थितम् ॥ ८१॥
दृष्ट्वा धृत्वा करो तस्य सखड्गं सम्भ्रमान्विता । तमाह नत्वा माश्वश्रीमं तदा मदनसुन्दरी ॥८२॥
विह्वला विगतोत्साहा वेपती अश्रुलोचना । मम तातं कंबुकण्ठमंतं हंसि कथं प्रभो ॥८३॥
मक्षिकापतनं पूर्वं ग्रासे एतच्चया कृतम् । शुभारम्भे पूर्वमेव दुःस्वप्नंमिवलम्बिनम् ॥८४।
मद्वाक्याञ्चैव हंतव्यस्तन्ममत्वां प्रार्थयाम्यहम् । एवं मदनसुन्दर्या वचः श्रुत्वा विहस्य सः ॥८५॥
कराद्विमुच्य तं खङ्गं स्वसूतं चोदयन्मुदा । सेनया स ययौ यावत्त्वथाऽयोध्यां पुरीं प्रति ॥८६॥
तावद्दुन्दुभिनिर्घोषानग्रे शुश्राव सेनया । पुनश्चाथ दृढीकृप्य यूपकेतुस्तदा पथि ॥८७॥
कस्येयं वाहिनी चेति चिंतयामास चेतसि । ततः शरं सुमोचैकं निजनामांकितं वलात् ॥८८॥
योजनांतरसेनायां शरः शत्रुघ्नसन्निधौ । पपान तत्पदाग्रे तं दृष्ट्वा स चकितस्तदा ॥८९॥
शरपुच्छे यूपकेतोर्नाम दृष्ट्वाथ शत्रुहा । निश्चितवान्यूपकेतुर्मागेऽग्रे वर्तते ध्रुवम् ॥९०॥
ततश्चापे स शत्रुघ्नः स्वनाम कितमुत्तमम् शरं संधाय विमुञ्च यूपकेतुं सुमोच ह ॥९१॥
स शरो यूपकेतोश्च मम्नकादूर्ध्वतस्तदा । अपतत्पृष्ठभागे स तं ददर्श पितुः शरम् ॥९२॥
तदा हृष्टो यूपकेतुः कुर्वन्दुंदुभि निःस्वान् । गत्वा वेगेन शत्रुघ्नं दृष्ट्वोत्प्लुत्य रथादधः । ९३॥
ननाम पितरं पत्न्या कंबुकंठं प्रदर्शयन् । तदा तं सुहृद ज्ञात्वा मोचयामास शत्रुहा ॥९४॥
कंबुकंठमुखाच्छ्रुत्वा सर्वं वृत्तं सविस्तरम् । शत्रुघ्नः प्रापिनस्तेन सुहृदा तत्पुरो ययौ ॥९५॥
कम्बुकण्ठ पैदल ही गदा लेकर दौड़ पड़ा ॥ ७७ । ७८ ॥ यूपकेतुने अपने बाणोंसे उनकी गदाके भी हजार टुकड़े कर दिये । इसके बाद वह गदा फेंककर कटार घूंसा मारा । तब यूपकेतुने अपने ससुर कम्बुकण्ठको रथकी ध्वजामें बान्ध दिया और सिर काटनेके लिए वेगके साथ तलवार उठायी ॥ ७९-८१ ॥ इस तरह सिर काटना उद्यत एवं हाथमें खड्ग लिए यूपकेतुको देखकर मदनसुन्दरीने प्रणाम किया और आँखोंमें आँसू भरकर कहा - ॥ ८२ । हे प्रभो ! मेरे पिता कम्बुकण्ठको आप क्यों मारना चाहते हैं ? पहले ही ग्रासमें मक्खी गिर पड़नेके समान आपने शुभके स्थानमें इस दुःखदायी कर्मको क्यों अपनाया है ? ॥ ८३ ॥ ८४ । अतः मेरी बात मानकर इन्हें मत मारिए । मैं आपसे यही प्रार्थना करती हूँ। यह कहती हुई मदनसुन्दरी विह्वल हो गयी, उसका उन्माद नष्ट हो गया वा वह कांप रही थी और नेत्रोंमें आँसूकी धाराएँ बहाती जा रही थी । इस प्रकार मदनसुन्दरीकी बात सुनकर यूपकेतु मुसकराये और खड्ग फेंककर अपने सारथीको रथ चलानेका संकेत किया, वे अपनी सेनाके साथ अयोध्यापुरीकी ओर चले ही थे ॥ ८५ ॥ ८६ ॥ इतनेमें आगेसे दुन्दुभीका घोष सुनाई पड़ा । अब अपना धनुष सम्हालकर सोचने लगे कि आगेसे यह किसकी सेना आ रही है। यह सोचकर उन्होंने अपने नामसे अंकित एक बाण वेगपूर्वक छोड़ा ॥ ८७ ॥ ८८ ॥ वह बाण उड़ता हुआ एक योजन तक गया और जहाँ सेना पड़ी हुई थी, वहाँ पहुंचकर शत्रुघ्नके चरणोंके आगे गिरा । उस बाणको देखकर शत्रुघ्न चकित हो गये । ८९ ॥ फिर बाणके पुच्छमें यूपकेतुका नाम देखकर शत्रुघ्नने निश्चय किया कि यूपकेतु आगे रास्ते में ही हैं ॥ ९० ॥ तदनन्तर शत्रुघ्नने भी अपने नामसे अंकित एक बाण उठाकर यूपकेतुकी ओर छोड़ दिया ॥ ९१ ॥ वह बाण यूपकेतुके ऊपरसे होता हुआ पीछे जा गिरा । यूपकेतु-ने अपने पिताका बाण देखा ॥ ९२ । तब प्रसन्न होकर दुन्दुभि जैसा गर्जन करते हुए वेगके साथ शत्रुघ्न-के पास पहुंचे । वहाँ पिताको देखते ही वे रथसे कूद पड़े और अपनी स्त्री मदनसुन्दरीके साथ जाकर शत्रुघ्न-को प्रणाम किया और ध्वजामें बँधे हुए कम्बुकण्ठको दिखाया । शत्रुघ्नने उन्हें अपना सम्बन्धी समझकर छुड़ा दिया ॥९३॥९४। फिर शत्रुघ्नने कम्बुकण्ठके मुखसे ही विस्तारके साथ समस्त वृत्तान्त सुना । इसके बाद कम्बुकण्ठके