श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९८ आनन्दरामायणे [सर्गः ३
सुमङ्गल्याः स्त्रियः सर्वाः कौसल्याद्यास्तु मातरः । रामादीन् पांगुलम्पादी नीराजनपुरःसरम् ॥२९०॥ कम्भुंभांस्तोयपूर्णान्वितुदिक्षु महीपरन् । सम्वत्स्य स्नापयामासुर्महावाद्यपुरःसरम् ॥२९१॥ तटाभ्यंगं स्वयं वापि कृत्वा मन्तुश्च मातरः । रामादीन् पूज्तः कृत्वा वस्त्रालंकारभूषिताः ॥२९२॥ अभ्यङ्गपूर्वकं पत्नी राजा दशरथोऽपि सः । समाहूय नृपस्त्रीश्च समाज्ञा म्वालिके गुरुः ॥२९३॥ मुक्ताविनिर्मिते राज्ञः पार्श्वे वामे न्यवेशयत् । अग्रे गर्भादिकांश्च ताः स्त्रियोऽवन्सननाः ॥२९४॥ हरिद्राकुंकुमालिप्तचरणा रेजिरेऽद्रुते । वसिष्ठो ब्राह्मणैर्युक्तो राजा गर्भादिभिर्मुदा ॥२९५॥ कृत्वा गणपतेः पूजां पुण्याह्यादितयं क्रमात् । कारयामास विधिवत्प्रतिष्ठां देवतस्य च ॥२९६॥ ग्रामाचारं कुलाचारं वृद्धाचारं तथा पुनः । देशाचारं च प्रमदाचारादीनकरोन्नृपः ॥२९७॥ तोयकुम्भं मंडपादिकानां पूजनमाचरत् । कौसल्याद्याः स्त्रियः सर्वा हरिपीतारुणैर्वरैः ॥२९८॥ हेमन्तन्तुर्वितैर्वस्त्रैर्दिशेजर्मंडपांगण । जनकश्च नृपैर्युक्तो महावाद्यपुरःसरम् ॥२९९॥ रामादीन् निजं गेहं नेतुकामः समाययौ । मंडपे पूजयामास रामादीन् जनकस्तदा ॥३००॥ हेम्नतन्तुद्रवैर्र्दव्यैर्वस्त्रैराभरणादिभिः । तदा विरेजुस्ते बालः सर्वे प्रमुदिताननाः ॥३०१॥ तानग्रे वारणेंद्रस्था दिव्यचामरवीजिताः । शृण्वन्तो वाद्यघोषांश्च दंपतः पुष्पवृष्टिभिः ॥३०२॥ हरिद्रांकितधान्यैश्च माङ्गल्यैर्मौक्तिकादिभिः । मातृभिश्चारुणेक्षांषु वर्षिताभिश्चहुर्मुहुः । ३०३॥ एव ते राघवाश्चाश्च पुरस्त्रीभिनिरीक्षिताः । प्रासादोपरि संस्थाभिलाजाभिर्वर्षिता मुहुः ॥३०४॥ ददृशुर्नर्तनान्यग्रे वारस्त्रीणां स्मिताननाः । वाटिकाः पुष्पवृक्षाणां वरमुक्ताप्रनिर्मिताः ॥३०५॥
भांति के पुष्प विखर दिये और साफ खास स्थानोंमें गलत्था तथा तारा बनवा दिये, पुष्पलताओ और मार्जारिक पाषा द्वारा उस समय वह नगरी गोद की दिव्य मा ३स गहन लगो । तदनन्तर शुभ मुहूर्तमे जिस रामका माताके शरीरम स्त्रियाके द्वारा तेल हुल्दा आदि मन, गया । उस समय कौमल्या आदि माताओने आंगन लेप तथा रामका पानी छिड़ककर जम्पूर्ण हंसक सहित चार सुन्दर घड़ोको चारो दिशाअम स्थापित करके राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्नको वाद्यत्कृतिक मध्य मङ्गलमय स्नान कराया ॥२९०-२९१॥ फिर तेल आदि मलकर अपन आप भी सब माताओन स्नान किया। पहिल नया आदिको वस्त्र तथा भूषणोसे भूषित करके तदनन्तर आरिका शरीरम अभ्यङ्ग करक मन्दकर) राजा दशरथने भी स्नान किया। पश्चात् गुरु वशिष्ठत नजाक सब नियोको समाद्रूपरम बुलाकर राजाके बामभागम मुक्तानिर्मित स्तम्भिक महित ( वरी या आसन, पर बैठाया। उस समय मबके आसनमे स्थिति राम आदि बालकोक समान बैठाकर भिन्न चुन किया तथा रूपी और तेल चरणाम लगाये अत्यन्त सुशो- भित होत हथी । बाह्मणके महित धषिष्ठजीन राग दशरथ साथ गभादिके द्वारा गणपतिपूजन तथा पुण्याहवाचन ये दोनों कर्म प्रमुख करवाये और तीसरा कर्म विधिनत् दस्ताकी प्रतिष्ठा करवायी । राजा दशरयन भा बादमे प्रसन्नतापूर्व ग्रामाचार कुलाचार, वृद्धाचार देशाचार तथा प्रमदाचार आदि किया ॥२९२-२९६ ॥ तदनन्तर अहपूर्ण कुम्भ तथा मण्डप आदिकी पूजा का। मण्डपके आँगनम हरी लाल, पीली तथा जरादार साड़ियोको पहनकर कौसल्या आदि स्त्रिय बड़ी सुन्दर दीसन लगा। बड़े बड़े बाजोनको बजवान हुए अन्य राजाओक सहित राजा जनक श्री राम आदिको अपने भवनमें लिवा ले जानके लिये वहाँ आये। मण्डपम जाकर राजा जनकन राम आदिका पूजन किया ॥ ३०० ॥ उस समय प्रसन्न मुखवाले वे सब बालक जर्रोदार दिव्य वस्त्रो तथा आभरणोका पहने हुए बड़े मुन्दर लगते लगे । ३०१॥ बादम वे सब जं कि उत्तम हाथियोपर बैठे हुए थे, जिनपर सुन्दर चैवर दुल रहे थे । हाथियोपर बैठा हुई माताएं चारो तरफम बारम्बार जिनपर मोतियो, माङ्गलक हरदामिश्रित चानलो तथा पुष्पोकी बौछार कर रही थीं । जिनके आ नगरकी स्त्रिय बड़े चावसे देख रही थी तथा भवनोंपरसे बालका लावा बरसा रहा थी । अनिन्तर मुझासे वहाँके रास्तेमे वेश्याओके नृत्य