भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 486

४७० आनन्दरामायणे [सर्गः १३

प्रत्युद्गम्य मुनिं रामो ददावासनमुत्तमम् । नत्वा सम्पूज्य विधिवत् सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥७७॥ ततो विहस्य वाल्मीकिः प्रोवाच रघुनन्दनम् । सर्वं वेत्सि भवान् राम किमर्थं मां तु पृच्छसि ॥७८॥ स्वचेत्पृच्छसि रामात्र मानुष्यं भावमाश्रितः । तर्हि ते कथयाम्यद्य शृणुष्व रघुनन्दन ॥७९॥ त्वयाऽत्र वर्जितं हास्यं त्वद्विद्या मर्कलर्जनैः हास्यकारीणि कर्माणि संत्यक्तान्यवनीतले ॥८०॥ विवाहादिसमुत्साहाः कथावार्त्तादिकौतुकम् । मङ्गलोन्माहगीतानि नृत्यं यज्ञादिसंक्रियाः ॥८१॥ यात्राः संस्तम्भरोन्माहास्त्यक्ताः पञ्चशतानि तु यद्यत्कर्म तोषकारि हास्यकारि च तन्नरैः ॥८२॥ एकसंवत्सरं नात्र क्रियते रघुनन्दन उन्माहदेवताः मत्तास्तथा कर्माङ्गदेवताः ॥८३॥ इन्द्रादिलोकपालाश्च दृष्ट्वा स्वांप प्ररोजनम् । तुम भूप्रां ततो गम तद्रूपं कथयन्विधिम् ॥८४॥ ततो विधिश्च तच्छ्रुत्त्वादसमर्थस्त्वायं निवेदितुम् । मयि कुटेशमामन्त्र्य योऽश्वत्थे सप्रवेशितः ॥८५॥ हितार्थं निर्जगाणां स सोऽद्य तिष्ठति पिप्पल त्राजकर्तृपद्रवान् राम छन्प्रुकमजु वशामनान् ॥८६॥ तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा राघवः क्रोधमाययौ । अहमेवाद्य गच्छामि भारं पश्यामि ब्रह्मणः ॥८७॥ कथं नाम रघुश्रेष्ठः स्वशिक्षां परिवर्त्तयेत् । इत्युक्त्वाज्ञापयामास स्वांयां सेनां तदा प्रभुः ॥८८॥ ततस्तं बोधयामास वाल्मीकिर्मुनिसत्तमः । क्रोधं त्यज रघुश्रेष्ठ शृणुष्व वचनं मम । सच्चिदानन्दसम्पन्नस्त्वमानन्दघनो नृप ॥८९॥ भवाऽस्ति चरितं राम तव किञ्चित्पुत्रयोर्मुखात् । त्वयाऽपि यज्ञसमये श्रुतं यल्ललटे पुरा ॥९०॥ यस्य संश्रवणाद्ब्रह्मानन्दरूपी भवेन्नरः । हास्यं वस्त्वेति चेत्त्वाह ते च्छास्तं त्त्रिदम् ॥९१॥ न जनाः कीर्त्तयिष्यन्ति मुखरूपं स्मितं विना । अन्यत् किंचित् प्रवक्ष्यामि प्रभो ब्रूश तवग्रतः ॥९२॥ शतकोटिमितं तेऽत्र चरितं यन्मया कृतम् । पुरा त्वया विविक्तं यत् सर्वमे रघुनन्दन ॥९३॥

का बुलवाया । यह सन्देश पाते ही वाल्मीकि रामके मिलनक चल दए ॥ ७६ ॥ तहाँ पहुंचतहीर रामन उठ- कर उनका अगवानी की और एक सुन्दर आसनपर बिठाकर पूजन किय । फिर जो कुछ वृत्तान्त बताना था, सो बताया ॥ ७७ ॥ यह सब सुना तो हंसकर वाल्मीकिने कहा- हे राम ! आपसे कुछ छिपा नहीं है, आप सब जानते हैं । फिर हमसे क्यों पूछते हैं ? ॥ ७८ । हाँ यदि मानवभावका आश्रय लेकर आप हमसे पूछते हैं तो बताता हूँ, सुनिए ॥ ७९ । आपने अपने राज्यमें हंसीको मनाही कर दी है। इससे सब लोगोंने ऐसे शुभ कार्योंका करना बन्द कर दिया है, जो हंसी-खुशीसे ही सम्पन्न होसकते हैं ॥ ८० । विवाह, कथावार्ता, खेल-तमाशे, नाच-गान, यज्ञादिक सत्क्रियाएं, यात्रा और सांवत्सरिक उत्सव आदि सब कामलोगोंने बन्द कर दिये हैं। कहनेका मतलब यह कि जितने कार्य हृदयको आनन्दित करनेवाले हैं, वे सब आज एक वर्षसे बन्द हैं । इससे व्याकुल होकर समस्त उत्साहदेवता, कर्माङ्गदेवता तथा इन्द्रादि लोकपाल भूमण्डलपर अपनी प्रजाको दुःखी होते देख ब्रह्माके पास गये और उन्हें अपना दुःख सुनाया ॥ ८१-८४ ॥ इसके बाद ब्रह्माजी आपसे कुछ कहने-सुननेमें असमर्थ होकर उस पीपल-वृक्षमें गुप्त रूपसे प्रविष्ट हो गये हैं। देवताओंकी कल्याण-कामनासे वे आज भी उसमें बैठे हुए हैं । जो कोई उस वृक्षको काटनेके लिये जाता है, वे उसपर पत्थर बरसाते हैं ॥ ८५ ॥ ८६ ॥ मुनिराज वाल्मीकिके मुखसे यह हाल सुनकर रामको क्रोध आ गया और उन्होंने कहा कि आज मैं स्वयं जाकर ब्रह्माका पराक्रम देखता हूँ । रघुवंशका एक श्रेष्ठ क्षत्रिय अपने आदेशमें किसी प्रकार का उलट- फेर नहीं कर सकता। इतना कहकर रामने अपनी सेना तैयार करनेकी आज्ञा दी ॥ ८७ । ८८ । तब वाल्मीकि समझाने लगे—हे रघुश्रेष्ठ ! इस प्रकार क्रोध न करके मेरी बात सुनिये। आप साक्षात् सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म हैं और आपका चरित्र लोगोंको आनन्दित करनेवाला है। उस दिन ही बनाकर आपके पुत्रोंके मुखसे यज्ञशालामें सुनवाया था, उसे आपने भी सुना है। जिस जिसके सुनने मात्रसे मनुष्य आनन्दमग्न हो जाता है, ऐसे पुनीत चरित्रको लोग यदि आपने हंसीका नियम रक्खेंगे तो नहीं सुन सकेंगे। क्योंकि कथा सुनकर आनन्दको प्राप्त लोग हंसे बिना नहीं रह सकेंगे। इसके सिवाय हे प्रभो ! मुझे आपसे कुछ और भी कहना