भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 500, कुल 811 में से

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पृष्ठ 500
४८४आनन्दरामायणे[ सर्गः १४

नष्टोद्धरणधीरश्च ३६ तथैव परमेश्वरः ३७।
तथा फलप्रदश्चैव ३८ तथा बलिवरप्रदः ३९ ॥१६८॥
भगवान् ४० मधुघाती च ४१ तथा यज्ञफलप्रदः ४२।
रघुनाथश्च ४३ लक्ष्मीशो ४४ वसिष्ठश्च ४५ तथैव हि ॥१६९॥
शरभ्यः ४६ षड्गुणैश्वर्यसम्पन्नश्च ४७ तथैव हि।
सर्वेश्वरो ४८ हयग्रीवः ४९ क्षमी ५० नामानि ते त्विति ॥१७०॥
पञ्चाशद्वर्णचिह्नानि चैभिर्वर्णैर्जगत्त्रयम् । व्याप्तं श्रीराम सर्वत्र घवर्णेन घटः स्मृतः ॥१७१॥
पवर्णेन पटो ज्ञेयस्त्वेवं वर्णात्मकं जगत् एकैकस्य च वर्णस्य भेदैर्नामानि ते पृथक् ॥१७२॥
नाहं समर्थो व्याख्यातुं पञ्चास्योऽपि न चक्षमः यत्र शेषः सहस्रास्यो वर्णने कुंठितस्त्वभूत् ॥१७३॥
एवं ते महिमा राम कोऽत्र वर्णयितुं क्षमः । तथाप धन्यो वाल्मीकिर्येन ते चरितं कृतम् । १७४।
शतकोटिमितं राम तवैव कृपया प्रभो ।

श्रीरामदास उवाच
इत्युक्त्वा स गुरुर्देवै राघवेणापि पूजितः । १७५।
दृष्ट्वा रामं ययौ स्वर्गं सत्यलोकं ययौ विधिः । वाल्मीकिश्चापि प्रययौ चित्रकूटं निजाश्रमम् ॥१७६॥
तदारभ्य जनाः सर्व चक्रुर्हासं मुदैव ते । मांगल्यकर्माप्युत्साहकर्माणि जगतीतले १७७॥
चक्रुः सर्वे पूर्ववच्च नातिहास्यं प्रचक्रिरे । स्त्रीभिर्नराः सुसन्तुष्टाः क्रीडाहस्यादिकं चक्रिरे ॥१७८॥

इति श्रीमत्शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्धे वाल्मीकिजन्मवृत्तवर्णनं नाम चतुर्दशः सर्ग ॥ १४ ॥


नसे 'नष्टोद्धरणधीर'। वसे 'परमेश्वर'। फंसे 'फलप्रद'। बंसे बलिवरप्रद'। भंसे भगवान्'। मंसे 'मधुघाती'। यंसे 'यज्ञफलप्रद'। रंसे 'रघुनाथ'। लंसे 'लक्ष्मीश', वंसे 'वसिष्ठ'। शंसे 'शरभ्य'। षंसे षड्गुणैश्वर्यसम्पन्न'। संसे सर्वेश्वर'। हंसे 'हयग्रीव'। क्षंसे 'क्षमी' । १६८-१७० ।। ये ही पचास नाम पचासों अक्षरोंके आधार हैं और इन्हींसे आकाश, पाताल, मृत्यु ये तीनों लोक व्याप्त हो रहे हैं। घवर्णसे घटका बोध होता है और पवर्णसे पट जाना जाता है। घट और पट इन दोनों शब्दाक्त ही अन्तर्गत समस्त जगत् है। एक-एक वर्णके भरसे सम्पूर्ण नामोंका वर्णन करनेकी सामर्थ्य मुझमें नहीं है ॥ १७१ ॥ १७२ ॥ मै ही नहीं, यदि पंचास्य अर्थात् शिवजीको बतलाना पड़े तो वे भी असमर्थ ही रहेंग। जिसकी महिमाका वर्णन करनेय एक सहस्र मुखवाले शेषजी भी असमर्थ हो गये, उसका वर्णन कौन कर सकेगा। फिर भी वाल्मीकिजी धन्य हैं, जिन्होंने सौ करोड़ श्लोकोंसे आपके चरितका वर्णन किया है ॥ १७३ ॥ १७४ ॥ हे प्रभो ! जो कुछ वाल्मीकिजीने किया है, सो सब आपकी कृपा है। श्रीरामदास कहते हैं कि इतना कहकर समस्त देवताओंके साथ देवगुरु बृहस्पति स्वर्गलोकको चले गये और ब्रह्माजी भी रामसे पूछकर अपने सत्यलोकको लौट गये। वाल्मीकिजी अपने आश्रम चित्रकूटको चल दिये । १७५ ॥ १७६ ॥ उसी समय सब लोग आनन्दके साथ हँसने-खेलने और संसारमें पहलेकी तरह मंगलमय तथा उत्साहप्रय सारे कार्य करने लगे। सबसे लोग प्रसन्नताके साथ परस्पर हँसी-दिल्लगी करने लगे। फिर भी अतिहास्य कोई नहीं करता था ॥ १७७ ॥ १७८ ॥

इति श्रीमत्शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे उत्तरार्धे चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥

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