श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 501, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १५ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८५
पञ्चदशः सर्गः
( राम और रामराज्यकी विशेषतायें )
श्रीरामदास उवाच
रामराज्ये महानन्दः सर्वाननामपि जन्तुषु । नवीभत्सं क्वापि कस्यद्धैर्ये निदामयं तथा ॥ १ । राज्यमासीदमापन्नं समृद्धबलवाहनम् अशेषैर्भिक्षुभिस्तूर्णं रूप्य हाटकभूषणैः ॥ २ । संस्फुटमिष्टापूर्तानां धर्माणाम् नित्यकर्मभिः सदा संपन्नासस्य च सुचिरं क्षेत्रमण्डलम् ॥ ३ । सुदेशं सुप्रजं सुपथ्यं सुशुभं बहुगोधनम् । देशं वनानां च गजिभिः परिगर्जितम् ॥ ४ सुगुप्ता यत्र वै ग्रामाः सुनिविष्टाङ्गनाजनाः । गुप्तैर्भूरिनिवेशयैः मुमुदाः फलपादपाः ॥ ५ । सुपद्मार्कप्रकाशाभा राजन्ते यत्र भूमयः । मद्या निमज्जगागेऽपि मन्ति न मानवाः । ६ । कुलान्येव कुलीनानि न चान्यापधनानि च । विभ्रमो यत्र नारीणां न सिद्धान्तेषु च कर्हिचित् ॥ ७ । नद्यः कुटिलगामिन्यो न यत्र विषये प्रजाः । तमोयुक्ताः क्षपा यत्र वह्नितेजो न मानवाः । ८ ॥ रजोयुजः स्त्रियो यत्र न धर्मबहुला नराः । धर्मसम्बन्धो यत्रासिन्नना नेम च भोजनात् ॥ ९ ॥ अनपत्यास्पदं यत्र न च वै राजपुरुषाः । दण्डः परशुदण्डानामुद्धवेनागजिषु । १० ॥ आतपत्रेषु नान्यत्र कश्चिन क्रोधोऽप्रमाद्यतः । अन्यत्रातोद्वेगदेशेषु च, वैरं पाण्डित्यनम् । ११ । अक्षिका एव दृश्यन्ते यत्र पाणिषपाणयः न, अन्यत्रातः । उल्लेखाः सामधना एव दृश्याः । १२ ।
श्रीरामदास बोले—हे शिष्य ! रामचन्द्रजीके राज्यके समयके सब जीवोंको सदा अधिक ही आनन्द रहता था। उस समय न कहीं आग होता, न भय-झगड़ा होता, न कोई किसकी निन्दा करता और न कोई किसीसे डरता था ॥ १ ॥ राज्य था उस समय शत्रुओंसे रहित और विविध प्रकारके वाहन तथा सेनासे परिपूर्ण था। रामराज्यमें ब्राह्मण सुखी थे और राज्यके रहनेवाले लोग सान-चाँदीके गहनोंसे लदे रहते थे। इष्ट-आपूर्त आदि धार्मिक कृत्य होते रहते थे और सारे खेत धान्यसे परिपूर्ण रहा करते थे ॥ २ । ३ ॥ भाव यह है कि उस समय समस्त प्रजा सुखी थी, प्रजा प्रसन्न थी और रहन-सहन उत्तम था। गौओक चरनेको सुन्दर घास उपजता था। धनोंक अधिकता थी सारा देश दयालुओंसे भरा पड़ा था ॥ ४ । उस राज्यके सब गाँवामे योजक सुन्दर कूप गड़े हुए थे। प्रजाके सब लोग धन धान्यसे परिपूर्ण रहत थे और अच्छे-अच्छे फूलों तथा सदा फल देनेवाल बृक्षोंसे बगीचासे सारा राज्य भरा रहता था ॥ ५ ॥ सदा बहुमूल्यवाले कितन ही मणियों राज्यकी भूमिवर बह रहा थे। ऐसे ही कुछ स्थान बचे थे जहाँ कि मनुष्योंका निवास नहीं था। बाकी सारा पृथ्वी मनुष्यमय भरा थी ॥ ६ ॥ उस समयके सभी मनुष्य कुलीन थे। अन्याय नहीं होता था और धनकी कमी नहीं रहती थी। उस समय स्त्रियोंम विभ्रम (लज्जा) दीखता था, किन्तु पण्डितोंमें विभ्रम (बड़ी भूल) नहीं रहता था ॥ ७ ॥ उस समय देशमें कुटिल (टेढ़ी बेंगी) बहनेवाली नदियाँ थीं, किन्तु प्रजा कुटिलता (दुष्टता) से सर्वथा बची हुई थी कृष्णपक्षकी रात्रिमें केवल तम (अन्धकार) था, मनुष्योंमें तम (तामस गुण) नहीं दीखता था माना सारे मनुष्य उस समय सात्त्विक थे ॥ ८ ॥ स्त्रियाँ रजोगुण (रजस्वला) होती थीं, पुरुष रजोगुण (राजस गुणयुक्त) नहीं थे। उस समय राज्यके लोग पैसोंसे अन्ध; अन्धे नहीं थे, किन्तु अन्य (अन्न) से कोई अनन्य नहीं था। अर्थात् सब लोग खाने-पीनेमें सुखी दीखते थे। उस समय राजपुरुषों (अधिकारियों) में अन्याय नहीं दीखता था। दण्ड केवल कुल्हाड़ी, मुशल तथा पाँसों ही में दीखता था। प्रजापर प्रजाको दण्डप्रयोगकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी ॥ ९ ॥ १० ॥ सन्ताप (घाम) केवल छतरियोंपर रहता था। रामराज्यका प्रजामें सन्ताप मानसिक दुःख कहीं नहीं रहता था। केवल रथ हाँकनेवाले सारथियोंके हाथमें प्राश (घोड़े या बैलकी रास) रहता था, किन्तु प्रजाके किसी मनुष्यको पाश (फाँसीका दण्ड) मिलता नहीं देखा गया। जड़ता (ठंडक) की बात केवल जलमें रहती थी।