भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 811 में से

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पृष्ठ 502

४८६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १५

कठोरहृदया यत्र योषितोऽपि न मानवाः । औषधेष्वेव यत्रास्ति कुशाग्रो न मानवे ॥१३॥ वेधोऽभ्यन्तरम् रत्नेषु शूलं मूर्ति... वै । कंपः सात्त्विकभावोत्थो न भयात्क्व पिकस्यचित् ॥१४॥ मत्ताः करिण एव यत्र दारिद्र्यं कुतुरेव न । दुर्लभत्वं पातकस्य सुलभं न च वस्तुनः ॥१५॥ इभा एव प्रमत्ता वै युद्धं चाप्याजितामये । दानहानिर्मदेष्वेव द्रुमष्वेव हि कण्टकाः ॥१६॥ जनेष्वेव दृढांग वै न कस्याप्युदरव्यथा । वनेषु गुणविश्लेषो बन्धोक्तिः पुस्तके दृढा ॥१७॥ दण्डत्यागं महेशास्ति यत्र दण्डधरे जने । दण्डवार्ता सदा यत्र कृताभ्यासकर्मणाम् ॥१८॥ मृगवास्तारकेष्वेव भिक्षुका ब्रह्मचारिणः । यत्र क्षपणका एव दृश्यन्ते मलधारिणः ॥१९॥ प्राणा मन्त्रधरा एव यत्र चञ्चलवृत्तयः । इत्यादि विविधै रामा राज्यं शशास सः ॥२०॥ धर्मराजो धर्मज्ञः श्रीरामः प्रतापवान् । ... दण्डमशोष्यायौ मुनिश्चलम् ॥२१॥ निश्चाय राज्यनीतिं विविधां पञ्चतामियात् । उपारूप महाबुद्धे प्रजा धर्मेण पालयन् ॥२२॥ तताप सूर्ये इव स दुहृदो हृदि नेत्रयोः । ... हृदयेऽप्यानन्दमानसेषु स्वकेष्वपि ॥२३॥ अवधूतमासण्डलान् कोदण्डं कलयन्मले । फलदानार्तगलोऽसि शत्रुसैन्यबलाहकैः ॥२४॥ स धर्मराजोऽभूद् धर्माधर्मविवेचकः । अदुष्टान्दण्डयन्नार्त्तो दण्ड्यांश्च परिदण्डयन् ॥२५॥ पाशेन पाशयाञ्चक्रे वैरिवर्गं द्विषद्गणम् । सेतुः पुण्यजनानाञ्चो रिपुराक्षसमर्द्दनः ॥२६॥ जगत्प्राणसमानश्च अगत्प्राणतनयस्य । राजराजः स एवाभूत्सर्वेषां धनदः सताम् ॥२७॥


किसी मनुष्यमें जड़ता (मूर्खता) नहीं थी। केवल स्त्रियोंकी कटिमें दुर्बलता रहती थी, मनुष्योंके हृदयमें नहीं ॥११॥१२॥ कल्पका विचार केवल रत्नमें रहता था, ... और औष्ण्यंभाव केवल (कूट औषधिविशेष) का नाम दाखता था, किसी मनुष्यमें कुष्ठरोग नहीं था ॥१३॥ वेध (छिद्र) केवल रत्नोंमें रहता था। शूल (छीनी) केवल मूर्ति बनानेवाले कारीगरोंके हाथमें रहता था, केवल सात्त्विक भावके उदय होनेपर लोगोंको कम्प होता था—भयसे नहीं। दुर्बलता पातकोंका था, और... इनमें कोई वस्तु अलभ्य नहीं थी ॥१४॥१५॥ मत्तवाले हाथी होते थे, मनुष्य नहीं। युद्ध जनक लवण ... में देखा जाता था। दानहानि (मदके प्रवाहका रुक जाना) केवल हाथियोंमें थी। वृक्षोंमें ही कटक (कांटे) रहते थे ॥१६॥ मनुष्योंमें विराग होता था, किन्तु किसीकी उदरव्यथा (खांसी) ऐसा नहीं देखा गया, जो कि वनोंमें गुणविश्लेष (प्रत्यञ्चाका वियोग) था, दृढ़बन्धाक्ति (कठिन बन्धन) केवल ग्रन्थों/पुस्तकोंके लिए थी ॥१७॥ शिवभक्तोंके लिए केवल दण्डत्याग किया जाता था। राजा दमन करता था प्रजाजनका, केवल सन्यासियोंमें दण्डवार्त्ता। दण्डग्रहण-सम्बन्धी रातदिन रहते थे। इसके सिवाय चारों वर्णके ऊपर प्रजा में कोई मागन (भिखारी) नहीं था। केवल ब्रह्मचारी भिक्षुक था। केवल क्षपणक (जैनधर्मके) लोग मल (कीचड़ वस्त्र) धारी थे ॥१९॥ प्राय श्रीराम चंचलता राखता था। इस प्रकारके गुणोंसे युक्त रामचन्द्रजी राज्य करते थे ॥२०॥ धर्मका तत्त्व जाननेवाले प्रतापशाली रामने इतने काल पर्यन्त तक निष्कंटक राज्य किया, उन्होंने अनेक प्रकारकी साङ्गोपाङ्ग सूर्याङ्गित करके अष्टाक्षर का अपना राज्यधानी यत्न से और धर्मपूर्वक प्रजापालन करते हुए प्रजाको भलीभांति उन्नत किया ॥२१॥२२॥ वे शत्रुओंके हृदयमें सदा सूर्यकी भांति तपते थे और मित्रोंके हृदयमें चन्द्रमाकी तरह हर्षके पहुंचाने वाले। इन्द्रके समान समराङ्गणमें अपना धनुष चमकाते हुए शत्रुसेनारूपी मेघोंका भङ्ग हेतु थे। ऐसा बराबर देखा गया है, महाराज रामचन्द्रजी धर्मराजकी तरह भलीभांति धर्म अधर्मकी विवेचना करके काम करते थे। जो दण्डके योग्य नहीं होते थे, उन्हें दण्ड नहीं देते थे और जो दण्डके योग्य होता, उसे अवश्य दण्ड देते थे शत्रुओंको समुद्रकी तरह रज्जुकी तरह उन्होंने बाँध रक्खा था। रिपुरूपी राक्षसोंका भी उपकार करके रामचन्द्रजी संसारमें सब महात्माओं में उच्च पदपर पहुँच चुके थे ॥२३-२६॥ जगत्की रक्षाके लिए रामचन्द्रजी जानके प्राण समान थे। अच्छे मनुष्योंको धनकी सहायता देकर वे स्वयं राजराज (कुबेर) हो रहे थे। शत्रुओंको भय दिखाकर रुद्र बन गये थे। यही कारण था कि जिससे

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