श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 503, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १५ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८७
स एव रुद्रमूर्तिश्च प्रैक्षिष्ट रिपुभीषणे । विश्वेदेवास्तमर्चन्तं तु स्तुवन्ति च भजन्ति च ॥ २८ ॥
अशक्यः स हि साध्यानां वसुभ्यो वसुनाधिकः । त्रयाणां विग्रहधरो दस्रोऽजस्ररूपधृक् ॥ २९ ॥
महद्गुणगणगण्यंस्तुतिनास्तोष्यन् गुणाः । यस्याध्वगो यस्तु नवाद्यधरोऽपि । ३० ॥
आक्रान्तेव गन्धर्वाभ्यश्शकं निवर्गान्तिः । रघुवक्षश्चामि तद्दुर्गं स्वर्गमोददम् ॥ ३१ ॥
नागा नागास्तिरश्चक्रुस्तस्य राज्ये बलाधमः । दनुज मनुजाकारं कृत्वा तं तु सिषेविरे ॥ ३२ ॥
आता गुप्तचरा यस्य गुप्तकाः पक्षिणो नृषु । मसेविष्यामहे राजन् मुग्ध्वां स्वस्ववैभवैः ॥ ३३ ॥
वयं ततस्त्वद्विषये सुरावामोऽपि दुर्लभः । इत्युक्त्वा गणचक्रं तं मघवायाः सिषेविरे ॥ ३४ ॥
अशिक्षयत्क्षितिपतेरिह यस्य तुरङ्गमान् । अभूगश्चाशत्रुचित् पक्ष्याने रथि स्थितः ॥ ३५ ॥
अशत्रान्यस्य तु मज्ञाश्चरणेषु वर्षणः । अमन्दिनो दृष्टामरुन्त्येऽपि दानिनः ॥ ३६ ॥
सदोऽजिरं च योद्धागे योद्वाश्च म्नाजिरे । न शास्त्रैर्जन कांधा शस्त्रैः केनचित्क्वचित् ॥ ३७ ॥
न नेत्रविषये जाता विषरे यस्य भूभृतः । सदा नृपवद्वा ऽप्यासतथा महावदः प्रजाः ॥ ३८ ॥
कलवानेक एवास्ति त्रिदिवेऽपि दिवौकसाम् । तस्य क्षोणीभृतः क्षोण्यां जनाः सर्वे कलाधराः ॥ ३९ ॥
एक एव हि कामोऽस्ति स्वर्गं सोऽप्यङ्गज केवलः । माहेता ह्यथ भूपाल सर्व कामा हि तद्भुवि ॥ ४० ॥
तम्योपवर्तनेऽप्येको न भूतो गोत्रभिन्क्वचित् । मद्य स्वर्गमहार्याजो गोत्रभिन्मार्गकीर्तितः ॥ ४१ ॥
क्षयी च तस्य रिपवे कोऽप्यक्षीण न केनचित् । त्रि विष्टपे अपानाथः पूर्व पक्षे क्षयिष्यते ॥ ४२ ॥
नाके नवग्रहाः भान्ति दृशास्तस्यानवग्रहाः । हिरण्यगर्भः स्वर्लोके चैक एव प्रकाशते ॥ ४३ ॥
हिरण्यगर्भाः सर्वेऽपि तन्मीषायामहालयाः । ममाश्र एकः स्वर्लोके निमलं भास्यशुमान् ॥ ४४ ॥
एव विश्वेदेव उनकी स्तुति और भजन करते थे । वे साध्य ( द्वादश गण विशेष ) के लिए भी अशक्य थे । वसु ( धन ) की अधिकतासे वे अष्टवसुओ से भी श्रेष्ठ थे । कामदेवके साक्षात स्वरूप थे और अश्विनीकुमारके समान सदा सुन्दर रूप धारण किये रहते थे ॥ २८-२९ ॥ वे अपने समाधारण पराक्रमसे गन्धर्वोसे भी श्रेष्ठ थे । कितने ही सद्गुणोंसे वे छतीस नृविद्याओं प्रमथ कर रहे थे । समस्त विद्याधर विद्या शिरोमणि थे और अपने गीतोके माधुर्यसे उन्होंने गन्धर्वोका भी मद क्षय कर दिया था । संसारभरक यशआवास स्वर्गके समान कमनीय रामके किल को रक्षा करते थे ॥ ३० ॥ ३१ ॥ दिग्गज तक हाथी रामके हस्तिसमूहसे पराजित हो गये थे । सारी दुनियाके दानव मनुजका रूप बना बनाकर रामका सेवा कर रहे थे ॥ ३२ ॥ उनके गुप्तचर राज्यके मनुष्योंम घुसकर अपना प्रभाव सिद्ध करनेके लिए गुप्तगो ( पक्षिभट दूतों ) से भी बाजी मार चुके थे । इन्द्रादि देवता रामके समीप आकर कहा कि हे महाराज ! हमारे पास जो कुछ वैभव है, वह सब लगाकर हम आपकी सेवा-शुश्रूषा करनेको प्रस्तुत हैं ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ इस युगमें जिसमें कोई वायु देवतासे भी जत्थ चलना सिखाते थे, जिसके पर्वतके समान ऊंचे बड़े-बड़े हाथियोंका अजस्रदानिहा (मस्त मदप्रवाह अथवा दानशीलता) देखकर संसारके कृपण मनुष्य भी दानी बन गये थे । जिसका राजसभाके बुद्धिमान पण्डित और सेनाके बड़े-बड़े योद्धा शास्त्र तथा शस्त्रसे कभी पराजित नहीं हुए थे ॥ ३५ ३७ ॥ उन रामके राज्यमें जैसे रुग्ण कहीं नहीं दीखता था, वैसे ही प्रजा में कभी किसी प्रकारकी विपत्ति भी नहीं दिखायी देती थी ॥ ३८ ॥ देवताओंके स्वर्ग जैसे राज्यमें केवल एक कलावान् चन्द्रमा था, किन्तु रामके राज्यमें सब मनुष्य कलाके भण्डार थे । स्वर्गमें केवल एक कामदेव था, सो भी अनङ्ग ( अर्थात् बिना शरीरका ) । किन्तु रामराज्यके सारे मनुष्य गुणवान् कामदेव (जैसे सुन्दर ) थे । रामके राज्यक्षेत्रमें खीझनेवाला भी कोई गोत्रभित् (जातिसे बहिष्कृत) मनुष्य नहीं मिल सकता था, किन्तु स्वर्गमे देवताओंके राजा स्वयं गोत्रभित् (इन्द्र थे ॥ ३९-४१ ॥ राम-राज्यमें कोई क्षयी (अपरेगी) नहीं सुना गया, किन्तु स्वर्गमें चन्द्रमा एक पक्षमें क्षय होत रहते हैं ॥ ४२ ॥ स्वर्गमें सर्वदा नौ ग्रह रहते हैं, किन्तु रामका राज्य अनवग्रह ( यानी आपको