भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः १८] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५०३

देशेभ्यः सकलेभ्यश्च सुपूज्यं दण्डकं भवेत् । दण्डकेन समो देशो न भूतो न भविष्यति ॥१०६॥
इति तां बालिकांमुक्त्वा भृगुस्तस्माद्धमालयम् । ययौ तां मुनये दत्त्वा विधिना मुनिसंयुतः ॥१०७॥
भृगोः शापाच्च दण्डेन दग्धं तद्राज्यमुत्तमम् । शतयोजनमानं तदभवद्वि समंततः ॥१०८॥
मद्रामागमनारम्यं भवतः स्वस्थं नभूद् तत् । पूर्ववद्दण्डकारण्यं चराचरसमाकुलम् ॥१०९॥
इति त्वया यथा पृष्टे तया लव मयोदिते । कंकणस्य दण्डकस्य विचित्रे त्वां कथानके ॥११०॥

श्रीरामदास उवाच
इत्यगस्तिमुखाच्छ्रुत्वा लवस्तुष्टोऽभवत्तदा । नत्वा मुनिं च श्रीरामसेवायांतत्परोऽभवत् ॥१११॥
अथ रामश्चोत्सवेन तस्मै चित्रांगदाय ताम् । हेमा ददौ विवाहेन महामंगलपूर्वकम् ॥११२॥
पारिबर्हं ददौ कोटिमितं वारणादिकम् । महामहोत्सवश्चासीदयोध्यायां प्रमोगृहे ॥११३॥
ततो विसर्जयामास चोग्रबाहुं नृपं प्रभुः । मुनयः पार्थिवाश्चापि ययुः स्वं स्वं स्थलं प्रति ॥११४॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्धे
हेमास्वयंवरो नाम सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥


अष्टादशः सर्गः

( राम द्वारा ब्राह्मणोंको रामनाथपुर राज्यका दान )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामस्त्वयोध्यायां रंजयामास जानकीम् । जुगोप मेदिनीं कृत्स्नां सप्तसागरमेखलाम् ॥ १ ॥
राममुद्रां विना कस्य साकेते शस्त्रधारिणः । नैवासीत्तुप्रवेशश्च रामराज्ये कदाचन ॥ २ ॥
नैवासीन्निर्गमश्चापि विना मुद्रां कदा बहिः । राममुद्रांकितं पत्र गृहीत्वा ते नृपोत्तमाः ॥ ३ ॥
समप्रगश्ने चक्रूर्म्यां कुत्राप्यकुण्ठिताः । राममुद्रास्वरूपं च ते वदामि शृणुष्व तत् । ४ ॥


मुनि तथा रामचन्द्रकी कृपासे वह देश फिर उसीका त्यों हो जायगा और वहाँके लोग सुखी ही जायेंगे। फिर वहाँ सुन्दरता दिखायी देने लगेगी वह पृथ्वीके समस्त देशोंसे पवित्र देश माना जाने लगेगा ॥ १०५ ॥ उस बालिकासे भृगुने कहा-भविष्यमे लोग कहेंगे कि दण्डकारणयके समान न कोई देश हुआ है और न होगा ॥१०६॥ ऐसा कहकर भृगुने उसे एक मुनिको सौंप दिया और स्वयं बहुतसे ऋषियोंके साथ तपस्या करनेको हिमालय-पर्वतपर चले गये। इस प्रकार भृगुके शापसे दण्डकका सौ रोजन राज्य जल-भुनकर राख हो गया । १०७ ॥ ॥ १०८ । हुम्हार और रामके आगमनसे यह फिर पूर्ववत् हो गया और उसमें विविध प्रकारके जीव-जन्तु आकर निवास करने लगे । इस प्रकार हे लव ! तुमने हमसे जो प्रश्न किये, सो दण्डकारण्य तथा इस कंकण-विषयक कथानक वह सुनाया ॥ १०९ । , ११० ॥ श्रीरामदासने कहा-इस तरह अगस्त्यकी बात सुनकर लव परम प्रसन्न हुए और अगस्त्यजीको प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रकी सेवाम लग गये ॥ १११ ॥ इसके अन्तर रामने उत्सवके साथ उस हेमा कन्याका विधिवत् ससमारोह विवाह करके चित्राङ्गदको दे दिया। उन्होंने कन्याके विवाहमें दहेजस्वरूप बहुतसे हाथा-घोडे आदि करोडोंकी सम्पत्तिका दान दिया । इसके बाद महाराज उग्रबाहुको विदा किया और निमंत्रणमें आये हुए राजे तथा ऋषिगण अपने-अपने स्थानको लौट गये ॥ ११२-११४॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'-भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे उत्तरार्धे सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥

श्रीरामदास बोले—इसके बाद रामचन्द्र सीताको प्रसन्न करते हुए सप्तसागर मेखालाबाली पृथ्वीको रक्षा करते रहे। रामके राज्यमें कोई भी शस्त्रधारी मनुष्य विना राममुद्रा-अंकित पत्र लिये नहीं आता था और बिना मुद्राके कोई बाहर भी नहीं जाने पाता था । राममुद्रासे चिन्हित पत्र लेकर संसार भरके राजे जहाँ चाहूँ