श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 527, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १९ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) [ ५११
संप्पूज्य मुकुटं रामः पूजयामास मञ्चकम् । दीपिकां दर्पणं पूज्य पुस्तकादीनपूजयत् ॥१८॥
पुनः संपूज्य स्वगुरुं पूर्वं विप्रेषु पूजितम् । उच्चासनस्थितं नत्वा कथां शुश्राव सन्मुखात् ॥१९॥
पुत्राभ्यां बन्धुभिः पत्न्या पण्डितैः परिवेष्टितः । ततः प्रप्रार्थितो रामः सीतया स मुहुर्मुहुः ॥२०॥
विप्रादिभ्योऽप्यथाहारं चकार स्वयमात्मनः । कामधेनूद्भवैरन्नैः कल्पवृक्षसमुद्भवैः ॥२१॥
मणित्रयविनिर्मैथ वह्नी शांतकृतेरपि । ततो भुक्त्वा हि तांबूलं बिभ्रद्रामोगिराभवः ॥२२॥
वस्त्राणि कटिं दिव्यवस्त्रैः शय्याोपरि दधात नः । एतस्मिन्नन्तरे पूर्वं समाहूतो ययौ भिषक् ॥२३॥
गणकोऽपि राघवस्य प्रत्युद्गम्यातिमानितौ । निषेदतु राघवस्य पूजयामास तौ प्रभुः ॥२४॥
ततो भिषक् सुखं स्थित्वा राघवस्य नदाज्ञया । ददर्श दक्षिणकरे नाडीं रामस्य सादरम् ॥२५॥
रत्नमुद्राकंकणाद्यैः शोभितस्योज्ज्वलस्य च । काष्ठ्यांगुष्ठमूले या धमनी जीवसाक्षिणी ॥२६॥
तच्चेष्टया सुखं दुःखं ज्ञायते च भिषग्वरैः । अतन्तो वैद्यवर्य्यः स सूक्ष्मबुद्ध्या व्यलोकयत् ॥२७॥
रामकर्णे विहस्याह रात्रचाव्राजिः श्रमः । तद्वैद्यवचनं श्रुत्वाऽकुतोद्रामः स्मिताननम् ॥२८॥
ततो वैद्याय तांबूलं ददौ रामः सदक्षिणम् । ततः स गणकः प्राह विस्तार्य सुस्फुटाक्षरम् ॥
पञ्चाङ्गपत्रं चित्रं च राघवाग्रे स्थितः सुधीः ॥२९॥
विघ्नेश्वरो ब्रह्माहर्य्यीशा सुरा भानुः शशी भूमिमुतो बुधः गुरुः ।
गुरुश्च शुक्रः शनिशहुकेतवः सर्वे सदा मंगलदा भवतु ते ॥३०॥
लक्ष्मीः स्यादनया तिथिश्रवणतो शतायुषं चोऽयूह्निर् नक्षत्रं कृतपापनाशनहरं योगो वियोगारहः ।
सर्वाभीष्टकरं तथैव करणं पंचांगमेतःस्फुटं श्रोतव्यं प्रतिवामरे द्विजमुखाच्छ्रेयस्करं मंगलम् ॥३१॥
स्वस्ति श्रीराघवायान्नि तिथिश्च दशमी सिता । भानुवारः सुनक्षत्रं पुष्याख्यं श्चद्य वर्तते ॥३२॥
वृक्ष, अश्व, हथी, रथ, आम्र, बाणुल, कङ्गार काम, पालकी, सिंहासन, छत्र, चमर, व्यजन, मुकुट, मच, दीपिका और दर्पणको पूजा करके पुस्तकादिका पूजन करते थे ॥१४-१८॥ फिर ऊँचे आसनपर बैठे अपने गुरुकी पूजा और नमस्कार करके उनके पूज्य कथा सुनते थे ॥१९॥ इसके अनन्तर अपने भ्राताओं, पुत्रों और पण्डितके साथ बार बार सीताके प्रार्थना करनेपर ब्राह्मणों के साथ स्वयं कल्पवृक्ष, कामधेनु और तीनों मणियोंस उत्पन्न तथा अग्निका तृप्त मंत्रका भोजन करके पान खाते थे। तदनन्तर सुन्दर कपडे पहिन तथा दिव्य वस्त्रसे कमर कसके भान्ति भान्तिने अन्य वस्त्र धारण करते थे। इनके बाद पहलेही ही बुलाये हुए वैद्य तथा ज्योतिषी आये। उनको आते देखकर राम उठ खड़े होते और दो पग आगे बढ़कर स्वागत करके उन्हें लाते एवं अभिमान सम्म न करते थे। वे आकर सामने बैठ जाते और राम उनकी पूजा करते थे ॥२०-२४॥ इसके बाद वैद्य आनन्दपूर्वक बैठकर रामके आज्ञानुसार रत्न, मुद्रा तथा कंकण आदिसे सुशोभित उनके दाहिने हाथकी नाडी देखता था। हाथके अंगूठेकी नीचेवाली जो जीवसाक्षिणी नामकी नाडी है, उसे देखकर वैद्यगण प्राणीके सुखदुःख जान लिया करते हैं। इसलिए वह वैद्य अपनी सूक्ष्म बुद्धिसे देखता और कानमें कहता कि 'रातको ज्यादा मेहनत किये हैं न?' वैद्यकी बात सुनकर राम मुस्करा देते थे ॥ २५-२८॥ इसके बाद राम दक्षिणाके साथ वैद्यजीको पान देते थे। तदनन्तर ज्योतिषीजी स्वच्छ अक्षरो और चित्रोंसे सुसज्जित पंचांग फैलाकर रामके सामने बैठते और इस प्रकार मङ्गलाचरण तथा पञ्चांगश्रवणका माहात्म्य सुनाते थे। विघ्नेश्वर (गणेशजी), ब्रह्मा, महेश, समस्त देवता, सूर्य, शनि, चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, राहु, केतु आदि सारे ग्रह आपके मंगलदाता हों ॥ २९ ॥ ३० ॥ तिथिके सुननेसे लक्ष्मी प्राप्त होती है, वारके श्रवणसे आयु बढ़ती है, नक्षत्रश्रवण युक्तकृत पापोंके समूहको नष्ट करता है, योग अपने प्रियजनके वियोगसे बचाता तथा करण सब प्रकारकी मन कामना पूर्ण करता है। अतएव ब्राह्मणके मुखसे प्रतिदिन इनका श्रवण करना चाहिए। क्योंकि यह प्राणियोका सब प्रकारसे कल्याण करता है ॥ ३१ ॥ स्वस्तिश्री रामचन्द्रजी ! आज शुक्लपक्षका दशमी तिथि है, रविवारहै, पुष्यनामक सुनक्षत्र है,